दिल्ली के प्रगति मैदान में दिल्ली पुस्तक मेले के दौरान ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने एक दिवसीय साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित किया। यहां लेखकों की किताबों का लोकार्पण हुआ, ‘पुस्तकें और प्रकाशन: बहुभाषी भारत का भविष्य’ पर चर्चा चली और बहुभाषी कवि गोष्ठी ने समा बांधा। विद्वानों ने भाषाओं की रक्षा और लेखन की जरूरत पर जोर दिया।
पुस्तक लोकार्पण से हुई शुरुआत
कार्यक्रम की शुरुआत ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के सदस्यों की पुस्तकों के लोकार्पण से हुई। इसमें डॉ. संदीप कुमार शर्मा, डॉ. अजय कुमार ओझा, डॉ. यशो यश, मीना कुमारी और रमा वर्मा श्याम की किताबों को लोकार्पित किया गया। इसके बाद ‘पुस्तकें और प्रकाशन: बहुभाषी भारत का भविष्य’ विषय पर परिचर्चा शुरू हुई। ऑथर्स गिल्ड के उपाध्यक्ष डॉ. मुकेश अग्रवाल ने अध्यक्षता की और महासचिव डॉ. शिवशंकर अवस्थी ने संचालन किया। डॉ. हरीश अरोड़ा, डॉ. राकेश पांडे, डॉ. वीरेंद्र शेखर, डॉ. युवराज सिंह और डॉ. हरिसिंह पाल ने अपने विचार रखे।
बहुभाषी भारत की विविधता पर जोर
परिचर्चा की शुरुआत डॉ. शिवशंकर अवस्थी ने की। उन्होंने बताया कि भारत बहुभाषी देश है, जहां 122 भाषाएं और 1,652 बोलियां हैं। उन्होंने कहा कि भाषाओं और लोकभाषाओं की सुरक्षा के लिए लेखन और प्रकाशन जरूरी है, बल्कि अनिवार्य है। ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के देशभर में साहित्यिक कार्यक्रमों का भी जिक्र किया। डॉ. हरीश अरोड़ा ने कहा कि भारत में जातियां, बोलियां और भाषाएं विविध हैं, इन्हें समझने के लिए पुस्तकें अहम हैं। उन्होंने मातृभाषा पढ़ाई की सरकारी योजना का जिक्र किया और कहा कि बहुभाषी होना जरूरी है, तभी अनुवाद से एक-दूसरे को जान पाएंगे। लिखना और प्रकाशित होना लेखक-प्रकाशक का दायित्व है।
डॉ. राकेश पांडे ने लेखकों-प्रकाशकों के रिश्ते पर बात की। उन्होंने रॉयल्टी में ईमानदारी की जरूरत बताई और कहा कि बहुभाषिकता का फायदा अंग्रेजी को मिल रहा है। संस्थाओं द्वारा पुस्तक खरीद की सही जानकारी लेखकों को नहीं मिलती। आठवीं अनुसूची की भाषाओं पर या तो हटा दें या सभी को शामिल करें।

लेखन और प्रकाशन की चुनौतियां
डॉ. वीरेंद्र शेखर ने विषय को उलझा लेकिन विचारणीय बताया। प्रकाशकों को लेखक का स्वागत करना चाहिए, इसके लिए दमदार लेखन जरूरी है। अमीश त्रिपाठी के लेखन और उपनिषदों के प्रकाशन का उदाहरण दिया। फिराक गोरखपुरी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, पंडित जवाहरलाल नेहरू, हरिवंश राय बच्चन जैसे विद्वानों के भाषा ज्ञान और लेखन की चर्चा की।
डॉ. युवराज सिंह ने कहा कि बहुभाषा का विवाद आज ज्यादा है, पहले कम था। पाठकों का अभाव है, लेकिन पुस्तक का कोई विकल्प नहीं। पाठ्यक्रम की किताबें अनिवार्यता से पढ़ी जाती हैं, लेकिन अन्य किताबों का पठन कम हो गया। पुस्तकालयों में किताबों पर धूल जम जाती है।
डॉ. हरिसिंह पाल ने कहा कि हम पुस्तकों के ऋणी हैं। पुस्तकालय विज्ञान के मुताबिक, पुस्तक पाठक की जरूरत है। कुछ पुस्तकालयों में पाठक नहीं, तो कुछ में जगह नहीं मिलती। पुस्तकालयों में खरीद कम होने और लोकगीतों के खत्म होने पर चिंता जताई। ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया बहुभाषा संरक्षण में सक्रिय है।
अध्यक्षीय वक्तव्य और कवि गोष्ठी
डॉ. मुकेश अग्रवाल ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि श्रुति परंपरा में चीजें खो जाती हैं, इसलिए लेखन जरूरी है। ई-पुस्तकें छपी किताबों का विकल्प नहीं, लेकिन समय की मांग हैं। जीवित रचनाएं वही जो कुछ कहती हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी अनुवाद करता है। सत साहित्य लिखने, प्रकाशक मिलने और अनुवाद की महत्ता पर जोर दिया।
दूसरे सत्र में डॉ. दिविक रमेश की अध्यक्षता में बहुभाषी कवि गोष्ठी हुई। इसमें डॉ. हरिसिंह पाल, डॉ. राकेश पांडे, डॉ. कमल किशोर कमल, डॉ. शिवशंकर अवस्थी, अतुल प्रभाकर, राधेश्याम बंधु, डॉ. युवराज सिंह, अंजलि अवस्थी, यशो यश, उमाकांत खुबालकर, जय बहादुर सिंह राणा, डॉ. वीरेंद्र शेखर, डॉ. अजय कुमार ओझा, अरुण कुमार पासवान, नीलम शुक्ल समेत 27 कवियों ने रचनाएं सुनाईं। डॉ. दिविक रमेश ने सभी का धन्यवाद दिया और गिल्ड की भाषा-विधा में बंधन न होने की प्रशंसा की। उनकी सरल कविता ने सबको मुग्ध किया।
राम भुवन सिंह, सीनियर रिपोर्टर
