जब सिलेंडर भरवाना भी मुश्किल हो जाए
कल्पना कीजिए — सुबह के छह बजे हैं, होटल का बावर्ची आ गया है, सब्जियां कट चुकी हैं, ग्राहक इंतजार कर रहे हैं — और रसोई का चूल्हा नहीं जलता। गैस खत्म। नया commercial LPG cylinder आएगा, लेकिन पैसे नहीं। दाम इतने बढ़ चुके हैं कि सिलेंडर भरवाना अब मुनाफे की कमाई से बाहर जा रहा है।
यही हकीकत है आज देश के छोटे होटल, ढाबा और रेस्तरां मालिकों की।
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Commercial LPG cylinder के दाम पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ते रहे हैं। जो cylinder कभी 1,200-1,400 रुपये में मिलता था, वो अब कई शहरों में 1,900 से 2,100 रुपये तक पहुंच गया है। छोटे शहरों और कस्बों में तो यह आंकड़ा और भी चिंताजनक है।
छोटे कारोबारियों की कमर टूट रही है
दिल्ली के लक्ष्मीनगर में एक छोटा ढाबा चलाने वाले रमेश कुमार कहते हैं — “पहले महीने में 15-16 सिलेंडर लगते थे। अब वही सिलेंडर इतने महंगे हैं कि या तो खाने के दाम बढ़ाओ, या धंधा बंद करो।” उन्होंने पिछले साल से ग्राहकों की संख्या घटते देखी है, क्योंकि थाली का दाम बढ़ाना पड़ा।
यह सिर्फ रमेश की कहानी नहीं है।
पूरे देश में — चाहे मध्यप्रदेश हो, उत्तरप्रदेश हो, या महाराष्ट्र — छोटे hotel और restaurant मालिक एक ही तरह की परेशानी झेल रहे हैं। Hotel and Restaurant Association of India (HRAI) जैसे संगठनों ने भी कई बार सरकार से commercial LPG gas की कीमतों को नियंत्रित करने की मांग उठाई है।
आंकड़े क्या कहते हैं
भारत में करीब 75 लाख से ज्यादा छोटे food service establishments हैं — जिनमें ढाबे, छोटे होटल, canteen, और roadside रेस्तरां शामिल हैं। इनमें से बड़ी संख्या ऐसी है जो पूरी तरह commercial LPG gas पर निर्भर हैं।
घरेलू LPG cylinder और commercial cylinder के दाम में जो अंतर है, वो इन कारोबारियों को और ज्यादा परेशान करता है। Domestic cylinder सब्सिडी के दायरे में आता है — commercial नहीं। यानी होटल मालिक को बाजार भाव पर ही गैस खरीदनी है, हर बार।
जब crude oil prices अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ते हैं, तो उसकी सीधी मार इन्हीं लोगों पर पड़ती है।
बंद हो रहे प्रतिष्ठान, रोजगार खतरे में
सिर्फ कारोबार नहीं, रोजगार भी जा रहा है।
एक छोटे होटल में कम से कम 4 से 10 लोग काम करते हैं। जब होटल बंद होता है, तो वेटर, रसोइया, सफाईकर्मी — सब बेरोजगार हो जाते हैं। ये वो तबका है जिसके पास कोई दूसरा option नहीं।
लखनऊ में तीन साल से रेस्तरां चला रहे मोहम्मद आसिफ का कहना है — “Rent बढ़ा, कच्चा माल महंगा, और ऊपर से commercial gas का बिल हर महीने 30-35 हजार पार कर जाता है। अब बताओ, 10 लोगों को तनख्वाह कहां से दें?” उन्होंने इसी साल अपने दूसरे outlet को बंद कर दिया।
सरकार की नीति और कारोबारियों की उम्मीद
Commercial LPG gas की pricing oil companies तय करती हैं और सरकार का सीधा हस्तक्षेप इसमें कम होता है। हालांकि, trade bodies लगातार यह मांग करती रही हैं कि खाद्य व्यवसाय से जुड़े छोटे कारोबारियों को कुछ राहत दी जाए — चाहे subsidy के रूप में हो, या फिर GST में reduction के जरिए।
कुछ राज्य सरकारों ने local level पर राहत देने की बात की है, लेकिन ठोस नीति अब भी नहीं बन पाई।
इस बीच, कुछ बड़े रेस्तरां chains ने piped natural gas (PNG) की तरफ रुख किया है जो relatively सस्ती पड़ती है — लेकिन यह option हर जगह उपलब्ध नहीं है। छोटे शहरों और कस्बों में PNG infrastructure अभी भी नहीं पहुंचा।
धुआं उठता है, लेकिन चूल्हा ठंडा है
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इस पूरे संकट के बीच जो सबसे दुखद तस्वीर है — वो यह है कि सड़क किनारे कभी खुशबू बिखेरने वाले वो ढाबे अब एक-एक करके बंद हो रहे हैं। ताले लग रहे हैं। जो चल रहे हैं, वो किसी तरह टिके हुए हैं।
Commercial LPG gas की बेलगाम कीमतें सिर्फ business की problem नहीं हैं — यह लाखों परिवारों की रोजी-रोटी का सवाल बन चुकी है। और इसका जवाब जब तक नहीं आता, चूल्हे ठंडे ही रहेंगे।
