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Tuesday, 03 Mar 2026

How Khamenei Killed: ऑपरेशन की पूरी कहानी, बेहद सुरक्षित परिसर में कैसे मारे गए ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई

जब आप इन पंक्तियों को पढ़ रहे हैं, तब तेहरान के उस बदनाम और अभेद्य परिसर से उठा धुआं शायद थम चुका होगा। लेकिन उस मलबे के नीचे दफन है वो राज़, जो पांच दशकों तक ईरान की ढाल बना रहा। अमेरिका और इस्राइल ने मिलकर जिस सुरक्षित परिसर को निशाना बनाया, वह ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई का आशियाना था — और अब वह इतिहास बन चुका है।

पहले जानिए वो बड़ी बातें, जो इस पूरे घटनाक्रम की नींव हैं
हमला: शनिवार की सुबह अमेरिका और इस्राइल ने ईरान पर हमला बोल दिया। ओमान की मध्यस्थता में चल रही बातचीत जब नाकाम हो गई, तो यह कदम उठाया गया।
खुफिया जानकारी: CIA महीनों से खामेनेई की दिनचर्या, उनके ठिकानों और आवाजाही के पैटर्न पर पैनी नज़र रखे हुई थी।
बदला हुआ प्लान: हमला पहले रात में होना तय था, लेकिन जैसे ही शनिवार सुबह की एक गुप्त बैठक की सूचना मिली — समय तुरंत बदल दिया गया।
निशाने पर कौन: खामेनेई के अलावा IRGC के चीफ, रक्षा मंत्री और सैन्य परिषद के प्रमुख भी इस ऑपरेशन के प्रमुख लक्ष्य थे।
हमले की ताकत: इस्राइली लड़ाकू विमानों ने खामेनेई के निवास परिसर पर करीब 30 बम दागे।
अंत: 86 साल के अयातुल्ला अली खामेनेई मारे गए — वही खामेनेई, जो 1989 से ईरान के सर्वोच्च नेता के रूप में देश की बागडोर थामे हुए थे।

अब सवाल-दर-सवाल समझते हैं इस ऑपरेशन की पूरी कहानी…
CIA की इसमें क्या भूमिका थी?
अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA इस पूरे ऑपरेशन की असली धुरी थी। एजेंसी ने महीनों की मेहनत से खामेनेई की गतिविधियों, उनके ठिकानों और रोज़मर्रा के पैटर्न को बारीकी से समझा। फिर एक दिन खबर आई कि शनिवार की सुबह तेहरान के एक प्रमुख सरकारी परिसर में ईरान के शीर्ष अधिकारियों की बैठक होने वाली है — और सबसे अहम बात यह कि खुद खामेनेई भी उसमें शामिल होंगे। यह जानकारी फौरन इस्राइल को दी गई। CIA की नजर में यह ‘हाई फिडेलिटी इंटेलिजेंस’ थी — यानी पूरी तरह पक्की और भरोसेमंद।


हमले का वक्त आखिर क्यों बदला गया?
मूल योजना थी कि हमला रात के अंधेरे में किया जाए। लेकिन जैसे ही उस सुबह की बैठक की खबर मिली, अमेरिका और इस्राइल ने तुरंत रणनीति बदल दी। दरअसल ईरान के राष्ट्रपति कार्यालय, सर्वोच्च नेता का दफ्तर और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद — तीनों एक ही परिसर में हैं। और उस सुबह तीनों जगहों से जुड़े शीर्ष नेता एक छत के नीचे मौजूद थे। यह मौका दोबारा नहीं आता। इसीलिए हमले की टाइमिंग बदलकर सुबह कर दी गई।
कौन-कौन से ईरानी नेता इस ऑपरेशन में निशाने पर थे?
इस्राइल को पहले से पता था कि उस बैठक में ईरान के सबसे ताकतवर सैन्य और सुरक्षा अधिकारी जमा होंगे। लक्ष्य था — एक झटके में सबको खत्म करना।

निशाने पर थे:
अयातुल्ला अली खामेनेई — सर्वोच्च नेता
∙ मोहम्मद पाकपुर — IRGC के कमांडर-इन-चीफ
∙ अजीज नासिरजादेह — रक्षा मंत्री
∙ एडमिरल अली शमखानी — सैन्य परिषद के प्रमुख
∙ सैयद माजिद मौसावी — IRGC एयरोस्पेस फोर्स के कमांडर
∙ मोहम्मद शिराजी — उप खुफिया मंत्री


हमला कैसे और ठीक किस वक्त हुआ?
द न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, इस्राइल में सुबह करीब 6 बजे लड़ाकू विमान उड़ान भरने लगे। विमानों की तादाद कम थी, लेकिन हर एक लंबी दूरी की और अत्यंत सटीक मिसाइलों से लैस था। उड़ान भरने के ठीक दो घंटे पांच मिनट बाद — यानी तेहरान के वक्त सुबह 9 बजकर 40 मिनट पर — मिसाइलें उस अभेद्य सरकारी परिसर पर आ गिरीं। बाद में एक इस्राइली रक्षा अधिकारी ने स्वीकार किया कि ईरान युद्ध के लिए तैयार था — फिर भी इस्राइल ‘टैक्टिकल सरप्राइज’ हासिल करने में कामयाब रहा।


क्या खामेनेई उसी इमारत में थे, जहां बाकी अधिकारी बैठे थे?
नहीं। परिसर की एक इमारत में ईरान के शीर्ष सुरक्षा अधिकारी बैठे थे, जबकि खामेनेई उसी परिसर की एक अलग — लेकिन पास की — इमारत में थे। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, जैसे ही खामेनेई के सटीक ठिकाने की पुष्टि हुई, इस्राइली विमानों ने उस पूरे परिसर पर 30 बम बरसा दिए।


ईरान के सैन्य और खुफिया तंत्र को कितना नुकसान पहुंचा?
इस ऑपरेशन से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, ईरान की खुफिया एजेंसियों का वरिष्ठ नेतृत्व बड़े पैमाने पर तबाह हो गया। हालांकि, शीर्ष खुफिया अधिकारी बचने में कामयाब रहा। पहले हमले के बाद और कई ठिकानों पर भी हमले हुए, जहां ईरानी खुफिया अधिकारी ठहरे हुए थे। ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी IRNA ने रविवार को एडमिरल शमखानी और मेजर जनरल पाकपुर की मौत की पुष्टि की — वही दो नाम, जिन्हें मारने का दावा इस्राइल पहले ही कर चुका था।


अमेरिका को खामेनेई की इतनी सटीक जानकारी कहां से मिली?
इसकी जड़ें पिछले साल के 12 दिनों के युद्ध में हैं। उस दौरान अमेरिका ने यह समझा कि दबाव में खामेनेई और IRGC किस तरह आपस में संपर्क करते हैं और कैसे एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं। इस समझ के आधार पर उनकी निगरानी की क्षमता को और पैना किया गया। द न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक पूर्व अमेरिकी अधिकारी के हवाले से बताया कि जून में राष्ट्रपति ट्रंप ने भी इसी नेटवर्क के भरोसे दावा किया था कि अमेरिका जानता है खामेनेई कहां हैं। तब से यह जानकारी और भी पक्की होती चली गई।


ईरान की सबसे बड़ी चूक क्या रही?
इस पूरे ऑपरेशन ने एक कड़वा सच उजागर कर दिया — ईरान के शीर्ष नेताओं ने अपनी सुरक्षा को लेकर पर्याप्त सतर्कता नहीं बरती, जबकि अमेरिका और इस्राइल खुलेआम युद्ध की तैयारियों के संकेत दे रहे थे। इतने नाजुक माहौल में इतने बड़े अधिकारियों का एक ही जगह इकट्ठा होना और खामेनेई का उसी परिसर में मौजूद रहना — यह एक घातक रणनीतिक भूल साबित हुई।


रॉयटर्स ने एक अमेरिकी सूत्र के हवाले से बताया कि मूल योजना में खामेनेई शनिवार शाम यह बैठक करने वाले थे। लेकिन इस्राइली खुफिया एजेंसी मोसाद ने भांप लिया कि बैठक का वक्त बदलकर सुबह कर दिया गया है। बस यही एक जानकारी काफी थी। हमले की पूरी टाइमिंग आगे खिसका दी गई और तेहरान को भनक तक नहीं पड़ी। खामेनेई ने शायद सोचा था कि वक्त बदलने से वे महफूज़ रहेंगे — लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

आगे क्या होगा?
अमेरिका और इस्राइल ने ईरान के सर्वोच्च नेतृत्व को तो खत्म कर दिया, लेकिन ईरान का पूरा सिस्टम इसी मकसद के लिए बनाया गया था — झटके झेलने के लिए। वहां हर बड़े पद के लिए उत्तराधिकार के चार स्तर पहले से तय हैं। यह वेनेजुएला जैसा कोई तख्तापलट नहीं है — यह एक ऐसी व्यवस्था है जो टूटती नहीं, बस बदल जाती है।

कौन थे खामेनेई?
1989 में जब इस्लामी क्रांति के जनक अयातुल्ला रूहुल्लाह खुमैनी का निधन हुआ, तब खामेनेई ने ईरान की कमान संभाली। खुमैनी ने पहलवी राजशाही को उखाड़ फेंका था, लेकिन उस क्रांति को एक फौलादी सैन्य और अर्धसैनिक ढांचे में ढालने का काम खामेनेई ने किया। उन्होंने एक ऐसा तंत्र खड़ा किया जो ईरान की रक्षा भी करता था और उसकी सीमाओं से परे उसका दबदबा भी बनाए रखता था।


सर्वोच्च नेता बनने से पहले खामेनेई 1980 के दशक में इराक के साथ हुए खूनी युद्ध के दौरान ईरान के राष्ट्रपति थे। उस थकाऊ और लंबे संघर्ष में जब पश्चिमी ताकतें सद्दाम हुसैन का साथ दे रही थीं, ईरान खुद को अकेला और घिरा हुआ महसूस कर रहा था। इसी दौर ने खामेनेई के मन में — खासतौर पर अमेरिका के प्रति — गहरा और स्थायी अविश्वास भर दिया।

1981 में क्या हुआ था?
यह पहली बार नहीं था जब खामेनेई किसी हमले का निशाना बने थे। 1981 में तेहरान की एक मस्जिद में हुए एक बड़े हमले में वे बाल-बाल बचे थे। उस वक्त वे सर्वोच्च नेता नहीं थे — एक प्रभावशाली धर्मगुरु थे, जो भाषण देने आए थे। हमलावर ने एक टेप रिकॉर्डर में बम छुपाकर उसे उस पोडियम के पास रख दिया था जहां खामेनेई बोलने वाले थे। जैसे ही उन्होंने संबोधन शुरू किया — कुछ ही पलों में धमाका हो गया।