चंडीगढ़ की उस दोपहर में विधानसभा का माहौल किसी आम सत्र जैसा नहीं था। सदन के भीतर नारेबाजी, बाहर धरना — और बीच में एक प्रस्ताव जिसने केंद्र और राज्य के बीच की खाई को एक बार फिर उजागर कर दिया।
पंजाब विधानसभा में आम आदमी पार्टी की सरकार ने केंद्र की ऊर्जा नीति के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पेश किया। मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार का आरोप है कि केंद्र सरकार की नीतियां पंजाब जैसे राज्यों के साथ सौतेला व्यवहार कर रही हैं — खासतौर पर बिजली आपूर्ति, कोयला आवंटन और power sector reforms के मामले में।
सदन में क्या हुआ उस दिन
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सत्र की शुरुआत होते ही विपक्षी दल — कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल — ने अलग-अलग मुद्दों पर हंगामा शुरू कर दिया। लेकिन जैसे ही ऊर्जा मंत्री हरभजन सिंह ईटीओ ने निंदा प्रस्ताव पढ़ना शुरू किया, पूरे सदन का ध्यान एक जगह केंद्रित हो गया।
प्रस्ताव में कहा गया कि केंद्र सरकार ने राज्यों को बिना पर्याप्त कोयला आपूर्ति किए thermal plants चलाने का दबाव बनाया। साथ ही, electricity amendment bill को लेकर भी राज्य सरकार ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई — जिसमें उनका कहना है कि इससे बिजली वितरण का निजीकरण का रास्ता खुलेगा और आम उपभोक्ता को महंगाई की मार झेलनी पड़ेगी।
मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा, “पंजाब के किसानों और गरीबों को मुफ्त बिजली देना हमारा वादा है। केंद्र की नीतियां इस वादे को पूरा करने में रोड़ा बन रही हैं।”
BJP विधायकों का वॉकआउट
जैसे ही प्रस्ताव पर चर्चा आगे बढ़ी, भारतीय जनता पार्टी के विधायकों ने सदन से वॉकआउट कर दिया। उनका कहना था कि यह प्रस्ताव राजनीति से प्रेरित है और केंद्र सरकार को बदनाम करने की कोशिश है।
BJP विधायक Ashwani Sharma ने बाहर आकर मीडिया से कहा, “AAP सरकार खुद की नाकामियां छुपाने के लिए केंद्र को दोष दे रही है। पंजाब में बिजली संकट किसकी वजह से है, यह सब जानते हैं।”
कांग्रेस ने इस बार एक अलग रणनीति अपनाई — वो सदन में रही, लेकिन प्रस्ताव का समर्थन करने से पहले कुछ संशोधन मांगे। पार्टी के नेता प्रताप सिंह बाजवा ने कहा कि वे केंद्र की नीतियों की आलोचना का समर्थन करते हैं, लेकिन राज्य सरकार भी अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती।
असली मुद्दा क्या है?
पंजाब में बिजली का सवाल सिर्फ तकनीकी नहीं, बेहद राजनीतिक है।
राज्य में AAP सरकार ने 300 यूनिट मुफ्त बिजली का वादा पूरा किया है — जो उसके लिए एक बड़ी political achievement है। लेकिन इस scheme का बोझ PSPCL (Punjab State Power Corporation Limited) पर पड़ रहा है, जो पहले से घाटे में है।
केंद्र सरकार का तर्क है कि Electricity Amendment Bill से distribution में competition आएगी और efficiency बढ़ेगी। लेकिन राज्य सरकारें — खासकर non-BJP शासित राज्य — इसे अपने अधिकारों पर हमला मानती हैं।
यह सिर्फ पंजाब की लड़ाई नहीं है। केरल, तमिलनाडु, राजस्थान और झारखंड जैसे राज्य भी इसी मुद्दे पर केंद्र से टकराव की स्थिति में हैं।
किसानों और आम लोगों की चिंता
विधानसभा के बाहर जब reporters ने आम लोगों से बात की, तो तस्वीर थोड़ी अलग निकली।
लुधियाना के एक छोटे दुकानदार रमेश कुमार ने कहा, “हमें नहीं पता कौन सही है, कौन गलत। बस इतना जानते हैं कि गर्मियों में बिजली नहीं आती और बिल बढ़ता जाता है।”
पंजाब के ग्रामीण इलाकों में किसानों को agricultural feeders पर बिजली मिलती है — जो अक्सर अनिश्चित और अपर्याप्त होती है। निजीकरण की आशंका उन्हें डराती है। उनका डर है कि अगर private companies आईं, तो subsidy खत्म हो जाएगी।
प्रस्ताव पास हुआ, लेकिन सवाल बाकी हैं
आखिरकार विधानसभा ने निंदा प्रस्ताव बहुमत से पास कर दिया। AAP के विधायकों ने मेज थपथपाई, नारे लगाए।
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लेकिन एक निंदा प्रस्ताव से न तो बिजली आती है, न दरें घटती हैं। यह एक राजनीतिक संदेश है — केंद्र को, और अपने मतदाताओं को भी।
पंजाब में अगले कुछ महीनों में local body elections की तैयारी है। ऊर्जा नीति का यह हंगामा उसी बड़ी चुनावी लड़ाई का एक हिस्सा भी हो सकता है — यह समझना मुश्किल नहीं है।
