लखनऊ, 22 दिसंबर 2025। उत्तर प्रदेश विधानसभा में वंदे मातरम के 150 वर्ष पूर्ण होने पर विशेष चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कांग्रेस और मोहम्मद अली जिन्ना पर सीधा निशाना साधा। उन्होंने राष्ट्रगीत को सांप्रदायिक रंग देने और भारत के सांस्कृतिक विभाजन का जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि वंदे मातरम पर किया गया समझौता धार्मिक भावना का सम्मान नहीं, बल्कि कांग्रेस की तुष्टीकरण की राजनीति का सबसे खतरनाक प्रयोग था, जिसने अलगाववाद को जन्म दिया। योगी ने जोर देकर कहा कि राष्ट्रगीत का विरोध पूरी तरह राजनीतिक था, न कि धार्मिक।
चर्चा की शुरुआत करते हुए सीएम योगी ने विधानसभा को संबोधित किया और वंदे मातरम को भारत की आत्मा बताया। उन्होंने कहा, “वंदे मातरम केवल गीत नहीं, बल्कि मातृभूमि की रक्षा, समृद्धि और गौरव का संकल्प है। 1905 के बंग-भंग आंदोलन से लेकर स्वतंत्रता संग्राम तक, यह क्रांतिकारियों का मंत्र रहा। रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसे भारत की आत्मा कहा, अरविंद घोष ने मंत्र, और मैडम भीकाजी कामा के फहराए पहले तिरंगे पर यह लिखा था।”
जिन्ना ने राष्ट्रगीत को राजनीतिक हथियार बनाया
मुख्यमंत्री ने मोहम्मद अली जिन्ना पर आरोप लगाया कि जब तक वे कांग्रेस में थे, वंदे मातरम कोई विवाद नहीं था। कांग्रेस छोड़ते ही जिन्ना ने इसे मुस्लिम लीग की राजनीति का औजार बना दिया। “15 अक्टूबर 1937 को लखनऊ से जिन्ना ने वंदे मातरम के विरुद्ध नारा बुलंद किया, जबकि उस समय कांग्रेस अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू थे। नेहरू ने 20 अक्टूबर को सुभाष चंद्र बोस को पत्र लिखकर कहा कि यह मुद्दा मुसलमानों को ‘आशंकित’ कर रहा है—यह तुष्टीकरण की स्वीकारोक्ति थी,” योगी ने कहा।
उन्होंने 26 अक्टूबर 1937 का जिक्र किया, जब कांग्रेस ने राष्ट्रगीत के कुछ अंश हटाने का फैसला लिया। “इसे ‘सद्भाव’ कहा गया, लेकिन वास्तव में यह राष्ट्र चेतना की बलि थी। देशभक्तों ने विरोध किया, प्रभात फेरियां निकालीं, लेकिन कांग्रेस वोटबैंक के साथ खड़ी रही।” सीएम ने जोर दिया कि 1896 से 1922 तक कांग्रेस के हर अधिवेशन में वंदे मातरम गाया जाता रहा। न कोई फतवा था, न धार्मिक विवाद। मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे नेता इसके समर्थक थे। समस्या मजहब को नहीं, बल्कि राजनीति को थी।
कांग्रेस का ‘राष्ट्रीय आत्मसमर्पण’
योगी ने 1923 के कांग्रेस अधिवेशन का उदाहरण दिया, जब मोहम्मद अली जौहर ने पहली बार विरोध किया। “जौहर ने विष्णु दिगंबर पलुस्कर द्वारा पूरा गीत गाने पर मंच छोड़ दिया। यह व्यक्तिगत था, लेकिन कांग्रेस का झुकना नीति बन गया। 17 मार्च 1938 को जिन्ना ने पूरा गीत बदलने की मांग की, लेकिन कांग्रेस ने प्रतिकार नहीं किया। नतीजा? मुस्लिम लीग का साहस बढ़ा, अलगाववाद तेज हुआ, और सांस्कृतिक प्रतीकों पर पहला समझौता हुआ, जिसने भारत विभाजन की नींव रखी।”
सीएम ने 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा द्वारा खंडित वंदे मातरम को मान्यता देने को भी कांग्रेस की तुष्टीकरण नीति का परिणाम बताया। “राष्ट्र ने गीत अपनाया, लेकिन कांग्रेस पहले ही उसे काट चुकी थी। वंदे मातरम का विरोध राजनीतिक था—खिलाफत आंदोलन तक यह हर मंच पर गूंजता था।”
राष्ट्रगीत के बाद आज राष्ट्रभाव पर हमला
मुख्यमंत्री ने चेतावनी दी कि तब राष्ट्रगीत को निशाना बनाया गया, आज राष्ट्रभाव को कमजोर करने की कोशिश हो रही है। “कुछ राजनीतिक शक्तियां विभाजनकारी सोच को पुनर्जीवित कर रही हैं। तुष्टीकरण की ऐतिहासिक भूलों से सीखकर ही विकसित भारत बनेगा।” उन्होंने सदन से आह्वान किया कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के ‘आनंद मठ’ का अध्ययन करें और वंदे मातरम को भविष्य का संकल्प बनाएं।
“मदनलाल ढींगरा के अंतिम शब्द वंदे मातरम थे। यह गीत प्रभात फेरियों, सत्याग्रहों और क्रांतिकारियों की अंतिम सांस तक का मंत्र रहा,” योगी ने भावुक स्वर में कहा।
विपक्ष की प्रतिक्रिया
चर्चा के दौरान विपक्षी दलों ने योगी के बयान पर आपत्ति जताई। सपा नेता ने कहा, “राष्ट्रगीत पर राजनीति करना दुर्भाग्यपूर्ण है। वंदे मातरम सबका है, इसे सांप्रदायिक बनाने की कोशिश गलत।” BJP प्रवक्ता ने पलटवार किया, “योगी ने इतिहास को तथ्यों के साथ रखा। तुष्टीकरण ने ही विभाजन को जन्म दिया।”
यह चर्चा वंदे मातरम के 150 वर्ष पूर्ण होने पर राष्ट्रीय स्तर पर भी गूंज रही है। क्या यह BJP की हिंदुत्व रणनीति का हिस्सा है? राजनीतिक जानकारों का इंतजार।
