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Wednesday, 04 Feb 2026

मोहन भागवत का संदेश: सामाजिक समरसता और धर्म के माध्यम से देश को मजबूत करें

समाज में समन्वय और त्याग की आवश्यकता

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने दिल्ली के विज्ञान भवन में संगठन के शताब्दी समारोह के अवसर पर अपने संबोधन में समाज में समन्वय और एकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि समाज में विविधता स्वाभाविक है, लेकिन कई बार यह संघर्ष का कारण बनती है। सभी को साथ लेकर चलने के लिए समन्वय स्थापित करना होगा, जिसके लिए कभी-कभी त्याग भी करना पड़ता है। भागवत ने जोर देकर कहा कि समाज के हर वर्ग को एकजुट होकर देश को मजबूत करना चाहिए। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि मृत्यु के बाद अलग-अलग वर्गों के लिए अलग श्मशान की सोच अस्वीकार्य है।

धर्म: शाश्वत सुख और मध्यम मार्ग का आधार

मोहन भागवत ने धर्म को शाश्वत सुख का आधार बताते हुए कहा कि यदि कोई चीज दुख का कारण बनती है, तो वह धर्म नहीं हो सकती। उन्होंने उपभोक्तावाद और वोक कल्चर को वैश्विक संकट का कारण बताया, जो लोगों को स्वार्थी बनाता है। भागवत ने स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत को अपने धर्म के बल पर दुनिया को मध्यम मार्ग दिखाना चाहिए, जो संघर्ष को कम करता है। उन्होंने कहा कि धर्म स्वभाव का मूल तत्व है, जिसका धर्मांतरण संभव नहीं है।

सामाजिक भेदभाव को समाप्त करने का आह्वान

अपने संबोधन के दूसरे दिन, भागवत ने कहा कि समाज में जातिगत भेदभाव को तुरंत समाप्त करना होगा। इसके लिए स्वयंसेवकों को अपने आसपास की बस्तियों तक पहुंचकर लोगों को जोड़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब तक समाज में अविश्वास और भेदभाव रहेगा, तब तक मजबूत संबंध स्थापित नहीं हो सकते। कमजोर वर्गों का सहयोग स्वाभाविक कार्य होना चाहिए। भागवत ने जोर दिया कि समाज को संगठित करने के लिए सभी को मिलकर काम करना होगा।

पड़ोसी देशों से आत्मीय संबंध की जरूरत

भागवत ने भारत के इतिहास और संस्कृति की एकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि केवल नक्शे पर रेखाएं खींचने से देश अलग नहीं हो जाते। उन्होंने पड़ोसी देशों के साथ आत्मीय संबंध स्थापित करने और उनके विकास की चिंता करने की वकालत की। उन्होंने कहा कि भारत को अपने पड़ोसियों के साथ सांस्कृतिक और भावनात्मक जुड़ाव को मजबूत करना चाहिए।

युवाओं की सोच और कुटुंब प्रबोधन

मोहन भागवत ने चिंता जताई कि आज के युवा व्यक्तिगत सोच पर केंद्रित हो रहे हैं, जिसके दुष्परिणाम समाज में दिखाई दे रहे हैं। इसके समाधान के लिए उन्होंने कुटुंब प्रबोधन की अवधारणा प्रस्तुत की। उन्होंने सुझाव दिया कि परिवारों को सप्ताह में एक बार एक साथ भोजन करते हुए अपनी धर्म-संस्कृति पर चर्चा करनी चाहिए। इस दौरान यह विचार करना चाहिए कि समाज और धर्म के लिए वेWHAT क्या योगदान दे रहे हैं। भागवत ने कहा कि सामाजिक समरसता के लिए परिवारों को आपस में जोड़ने का प्रयास करना होगा।

हिंसा का रास्ता नहीं, एकता का मार्ग

भागवत ने स्पष्ट किया कि अपनी बात मनवाने के लिए हिंसात्मक तरीके का उपयोग नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि हिंसा से देश को तोड़ने का प्रयास किया जाता है, जो समाज के लिए हानिकारक है। इसके बजाय, सभी को अपनी परंपराओं, जैसे भोजन, भजन और वस्त्र, को अपनाते हुए एकता और समरसता की दिशा में काम करना चाहिए।

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