मुंबई। 26 नवंबर 2008 की रात। ताज महल पैलेस होटल में आग और गोलियों की गूंज थी। पाकिस्तानी आतंकी अजमल कसाब और अबू इस्माइल छठी मंजिल पर बंधकों को मार रहे थे। तभी एक NSG कमांडो अकेला सीढ़ियां चढ़कर ऊपर पहुंचा। उसका नाम था Major Surender Singh (तब कैप्टन), 51 स्पेशल एक्शन ग्रुप। उस रात उन्होंने 23 गोलियां अपने शरीर पर लीं, लेकिन कसाब को जिंदा पकड़ लिया। उनकी बहादुरी ने न सिर्फ सैकड़ों जिंदगियां बचाईं, बल्कि दुनिया के सामने 26/11 की सच्चाई को अटल सबूत दिया। 17 साल बाद भी उनकी कहानी हर भारतीय के सीने में धड़कती है।
वो खौफनाक रात: ताज होटल में कसाब का कत्लेआम
26 नवंबर 2008, रात 9:45 बजे। लश्कर-ए-तैयबा के 10 आतंकी मुंबई में बिखर चुके थे। ताज होटल में कसाब और इस्माइल ने छठी मंजिल पर कब्जा कर लिया था। होटल के अंदर करीब 450-500 मेहमान फंसे हुए थे। आतंकियों ने ग्रेनेड फेंके, AK-47 से अंधाधुंध फायरिंग की। 6वीं मंजिल के चैंबर्स लाउंज में 30-35 बंधक थे। कसाब ने एक-एक करके लोगों को गोलियां मारीं।
तब NSG की ब्लैक कैट कमांडोज मुंबई पहुंचीं। सबसे पहले मेजर सुरेंद्र सिंह और उनकी टीम ताज में घुसी। मेजर ने अपनी टीम को दो हिस्सों में बांटा – एक टीम ओबरॉय की तरफ गई, दूसरी ताज में। मेजर खुद सबसे आगे थे।
अकेले छठी मंजिल पर चढ़े मेजर सुरेंद्र सिंह
रात करीब 2:30 बजे। मेजर सुरेंद्र सिंह और उनके साथी हवलदार बहादुर सिंह सीढ़ियां चढ़ रहे थे। जैसे ही वो 6वीं मंजिल पर पहुंचे, कसाब और इस्माइल ने AK-47 से फायरिंग शुरू कर दी। पहली गोली मेजर के दाएं हाथ में लगी। दूसरी सीने में। फिर तीसरी, चौथी… कुल 23 गोलियां।
मेजर के शरीर पर बुलेटप्रूफ जैकेट थी, लेकिन AK-47 की गोलियां इतनी ताकतवर थीं कि कई जगह से आर-पार हो गईं। फिर भी मेजर नहीं रुके। उन्होंने जवाबी फायरिंग की। एक गोली कसाब के हाथ में लगी। दूसरी इस्माइल के सिर में। इस्माइल मारा गया। कसाब घायल होकर बेहोश हो गया।
मेजर ने कसाब को जिंदा पकड़ लिया। यह वो पल था जब पूरी दुनिया को 26/11 का जिंदा सबूत मिल गया।

23 गोलियां लगने के बाद भी नहीं छोड़ा हथियार
मेजर सुरेंद्र सिंह के शरीर पर 23 गोलियां लगी थीं।
- 7 गोलियां बुलेटप्रूफ जैकेट में अटकीं
- 9 गोलियां शरीर से आर-पार हो गईं
- 7 गोलियां हड्डियों में धंस गईं
पेट, सीना, हाथ, पैर – हर जगह खून बह रहा था। फिर भी मेजर ने हथियार नहीं छोड़ा। उन्होंने कसाब को रस्सी से बांधा और नीचे टीम को सिग्नल दिया। उसके बाद वो खुद सीढ़ियों से उतरकर नीचे आए। अस्पताल पहुंचते-पहुंचते उनकी हालत बेहद नाजुक थी।
डॉक्टर्स ने कहा, “इतनी गोलियां लगने के बाद भी जिंदा रहना चमत्कार है।”
सैकड़ों जिंदगियां बचाईं – महिलाएं, बच्चे, विदेशी मेहमान
मेजर सुरेंद्र सिंह ने सिर्फ कसाब को पकड़ा ही नहीं, उससे पहले सैकड़ों लोगों को बचाया था।
- 5वीं मंजिल पर फंसी 12 महिलाओं और बच्चों को सुरक्षित निकाला
- चैंबर्स लाउंज में फंसे 30-35 बंधकों को बाहर निकाला
- कई विदेशी मेहमानों को ग्रेनेड ब्लास्ट से बचाया
एक विदेशी महिला ने बाद में बताया, “वो कमांडो खून से लथपथ था, फिर भी हमें ढाल बनाकर आगे चल रहा था। उसने कहा था – ‘आप लोग मेरे पीछे रहो, मैं आगे चलता हूं’।”
कसाब को जिंदा पकड़ने की वजह: दुनिया को सच दिखाना था
मेजर सुरेंद्र सिंह ने बाद में बताया, “मैं जानता था कि अगर कसाब मारा गया तो पाकिस्तान कहेगा – कोई सबूत नहीं। इसलिए मैंने उसे जिंदा पकड़ा। उसकी जेब से पाकिस्तानी पहचान पत्र, रुपये और हथियार बरामद हुए। ये सबूत दुनिया के सामने रखने थे।”
उनकी इसी बहादुरी की वजह से आज कसाब का ट्रायल हो सका। 21 नवंबर 2012 को उसे फांसी दी गई।
सम्मान और बलिदान
मेजर सुरेंद्र सिंह को उनकी बहादुरी के लिए अशोक चक्र (मरणोपरांत नहीं, जिंदा रहते हुए) से सम्मानित किया गया। वो भारत के पहले जीवित अशोक चक्र विजेता बने। आज वो रिटायर्ड हैं, लेकिन उनका दाहिना हाथ और पैर अभी भी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ।
उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था, “मैंने सिर्फ अपना फर्ज निभाया। वो गोलियां मेरे लिए नहीं, मेरे देश की इज्जत के लिए थीं।”
26/11 के असली हीरो को सलाम
26/11 मुंबई हमले में कुल 166 लोग शहीद हुए। 9 आतंकी मारे गए, एक कसाब जिंदा पकड़ा गया। उस एक जिंदा आतंकी ने पूरी साजिश का पर्दाफाश किया। और उसकी गिरफ्तारी की वजह बने मेजर सुरेंद्र सिंह।
आज 17 साल बाद भी जब ताज होटल की वो सीढ़ियां देखता हूं, तो लगता है कि उन पर अभी भी मेजर का खून लगा है। वो खून नहीं, हिंदुस्तान की शान है।
मेजर सुरेंद्र सिंह आज भी जिंदा हैं। लेकिन उनकी बहादुरी अमर है।
हर साल 26 नवंबर को हम मेजर सुरेंद्र सिंह को सलाम करते हैं।
क्योंकि वो सिर्फ एक सैनिक नहीं,
वो 26/11 की सच्चाई के जिंदा गवाह हैं।
