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Saturday, 25 Apr 2026

कमांडो सुरेंद्र सिंह: देशभक्ति और साहस की अनूठी मिसाल

हरियाणा के जाट परिवार से लेकर देश सेवा तक का सफर

नई दिल्ली: कमांडो सुरेंद्र सिंह की कहानी साहस, देशभक्ति और समर्पण की ऐसी मिसाल है, जो हर भारतीय के दिल को छूती है। हरियाणा के झज्जर जिले के छारा गांव में एक जाट किसान परिवार में जन्मे सुरेंद्र सिंह ने अपनी जिंदगी देश के नाम कर दी। उनके पिता शेर सिंह और माता कृष्णा देवी की परवरिश में उन्होंने न केवल पढ़ाई में उत्कृष्टता हासिल की, बल्कि बास्केटबॉल में राष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी बनकर गांव का नाम रोशन किया।

सेना में शुरुआत और कारगिल युद्ध का पराक्रम

सुरेंद्र सिंह ने गांव के सरकारी स्कूल से दसवीं तक की पढ़ाई पूरी की और 5 जुलाई 1997 को भारतीय सेना की ग्रेनेडियर रेजिमेंट, जबलपुर में भर्ती हुए। जयपुर में पहली पोस्टिंग के बाद 1999 में कारगिल युद्ध में द्रास सेक्टर में दुश्मनों से लोहा लिया। जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी कई ऑपरेशनों में हिस्सा लिया और 2005-06 में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन में भी अपनी सेवाएं दीं। उनकी देशभक्ति तब और निखरी, जब नवजात बेटे के जन्म के समय भी उन्होंने परिवार से पहले ड्यूटी को चुना। उनकी पत्नी मुकेश कुमारी रोहतक के अस्पताल में थीं, लेकिन सुरेंद्र ने देश सेवा को प्राथमिकता दी।

26/11 मुंबई हमले में वीरता की गाथा

26 नवंबर 2008 को मुंबई के ताज महल होटल पर हुए आतंकी हमले में सुरेंद्र सिंह पहले एनएसजी कमांडो थे, जो भारतीय वायुसेना के हेलीकॉप्टर से उतरे। आतंकियों की गोलियों और बम विस्फोट से घायल होने के बावजूद, उन्होंने दो आतंकियों को मार गिराया और 627 लोगों को सुरक्षित निकाला। इस हमले में उनके कान की सुनने की क्षमता चली गई और गंभीर चोटों के कारण 15 नवंबर 2011 को सेना ने उन्हें 100% युद्ध विकलांगता पेंशन के साथ रिटायर किया। उनकी वीरता ने ऑपरेशन ब्लैक टॉरनेडो को सफल बनाया, जिसमें ताज होटल, नरीमन हाउस और ओबेरॉय होटल में 8 आतंकियों को ढेर किया गया।

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राजनीति में प्रवेश और आम आदमी पार्टी

सेना से रिटायर होने के बाद सुरेंद्र सिंह ने अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में हिस्सा लिया। उन्होंने कांग्रेस सरकार की 26/11 हमले में कथित लापरवाही को उजागर किया। इसके बाद 2012 में आम आदमी पार्टी (आप) के गठन में संस्थापक सदस्य बने और राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल हुए। 2013 में दिल्ली कैंट से विधानसभा चुनाव लड़ा और 355 वोटों से जीत हासिल की। 2015 में फिर से दिल्ली कैंट से 40,133 वोटों के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की, जो क्षेत्र का रिकॉर्ड है। हालांकि, आप की भ्रष्टाचार और जनविरोधी नीतियों के खिलाफ 2020 में उन्होंने पार्टी छोड़ दी।

भाजपा के साथ नया अध्याय

29 नवंबर 2022 को सुरेंद्र सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों और राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रभावित होकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) जॉइन की। दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा के नेतृत्व में उन्होंने आप सरकार के खिलाफ कई आंदोलनों में हिस्सा लिया। उनकी अगुवाई में दिल्ली में भाजपा की सरकार बनी। सुरेंद्र सिंह ने दिल्ली छावनी के विधायक के रूप में सीएम के संसदीय सचिव और कैबिनेट मंत्री (जीएनसीटीडी) का दर्जा भी हासिल किया।

देश सेवा से लेकर राजनीति तक का प्रेरणादायक सफर

कमांडो सुरेंद्र सिंह की जिंदगी एक सैनिक, समाजसेवी और राजनेता के रूप में प्रेरणा देती है। अन्ना हजारे को अपना गुरु मानकर उन्होंने राजनीति में कदम रखा और दिल्ली छावनी का दो बार प्रतिनिधित्व किया। उनकी वीरता और समर्पण ने उन्हें 26/11 हमले का नायक बनाया, और उनकी राजनीतिक यात्रा ने उन्हें जनता का सच्चा सेवक साबित किया।

 

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