298 वोट मिले, फिर भी हार गई सरकार
16 अप्रैल 2026 की शाम लोकसभा में जो हुआ, वो सत्ता के गलियारों में किसी ने सोचा नहीं था। 21 घंटे की माथापच्ची, बहस, नारेबाजी और रणनीतिक दांवपेंच के बाद जब वोटिंग हुई — तो सरकार के पास 298 वोट थे। विपक्ष के पास 230। देखने में सरकार आगे लगती थी। लेकिन संविधान संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत चाहिए था — यानी करीब 352 वोट। और वो नहीं मिले।
नतीजा? संविधान का 131वां संशोधन विधेयक 2026 — जो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लाने वाला था — गिर गया।
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मोदी सरकार के लिए यह 12 साल में पहली बड़ी संवैधानिक हार थी।
अमित शाह की रणनीति पहली बार ‘पिट’ गई
संसद के भीतर जो लोग बैठे थे, वो बता रहे थे कि माहौल असामान्य था। INDIA गठबंधन जिस एकजुटता के साथ खड़ा हुआ, वो पिछले कई सत्रों में नहीं दिखी थी। NDA के रणनीतिकार आखिरी वक्त तक संख्या जोड़ते रहे, लेकिन गणित नहीं बैठा।
जानकारों का कहना है कि शायद पहली बार सदन में गृहमंत्री अमित शाह की floor management नाकाम रही। वो नाम जो हर मुश्किल बिल को पार करा देता था — इस बार चूक गया।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “यह बिल महिलाओं के नाम पर संविधान पर हमला था। विपक्ष ने इसे रोककर लोकतंत्र की रक्षा की है।”
कांग्रेस और सहयोगी दलों ने इसे अपनी बड़ी जीत बताया। जश्न मनाया। प्रेस कॉन्फ्रेंस की।
विपक्ष बोला — ‘छलावा था यह बिल’

बिल गिरने से पहले ही विपक्षी दलों ने इस पर हमला बोल दिया था। उनका तर्क था कि यह बिल सिर्फ कागज पर महिलाओं को अधिकार देने की बात करता था, असल में यह परिसीमन और चुनावी नक्शे को नए सिरे से बनाने की साजिश थी।
एक विपक्षी नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “अगर यह बिल सच में महिलाओं के हित में होता, तो OBC और EWS महिलाओं को भी इसमें जगह मिलती। वो क्यों नहीं थी?”
यह सवाल सत्तापक्ष के लिए असहज था।
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BJP का जवाब — सड़क पर उतरेंगे
सरकार चुप नहीं बैठी। बिल गिरने के अगले दिन ही BJP ने देशभर में विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया। पार्टी की रणनीति साफ थी — विपक्ष को महिला विरोधी साबित करो।
एक NDA नेता ने कहा, “जो लोग सदन में महिला आरक्षण के खिलाफ खड़े हुए, उन्हें जनता जवाब देगी।”
PM मोदी और HM अमित शाह इस मुद्दे को कांग्रेस के इतिहास से जोड़ने की तैयारी में हैं। याद दिलाया जाएगा कि महिला आरक्षण बिल पहले भी कई बार आया और कांग्रेस के शासन में अटका रहा।
लेकिन राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि इस बार खेल पलट गया है। विपक्ष ने खुद को बचावकर्ता की बजाय हमलावर की भूमिका में रख लिया है।
अब आगे क्या?
बिल गिरने के बाद सरकार ने परिसीमन और अन्य संबंधित विधेयक भी आगे नहीं बढ़ाए — क्योंकि वो मुख्य बिल पर निर्भर थे। लेकिन सरकारी सूत्रों के मुताबिक मोदी सरकार इस मुद्दे को यहीं नहीं छोड़ेगी।
समझा जाता है कि नई रणनीति के तहत दो या तीन अलग विधेयक लाए जा सकते हैं। एक विकल्प यह है कि लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 850 तक की जाएं और उसमें 33% महिला आरक्षण सुनिश्चित किया जाए — साथ में SC/ST के लिए सब-कोटा भी रखा जाए। दूसरा विकल्प परिसीमन आयोग को राज्यों की मंजूरी से अलग रखना है, ताकि दो-तिहाई बहुमत की जरूरत न पड़े।
लेकिन इन रास्तों पर चलना भी आसान नहीं होगा। OBC आरक्षण का सवाल फिर उठेगा। EWS का मुद्दा फिर आएगा। और विपक्ष इस बार और तैयार होगा।
2029 से पहले का असली दांव
इस पूरे घटनाक्रम का असर सिर्फ संसद तक सीमित नहीं रहेगा। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। INDIA गठबंधन की एकजुटता का यह संदेश वहां भी पहुंचेगा।
2029 के लोकसभा चुनावों से पहले यह घटना राजनीतिक ध्रुवीकरण को और तेज कर सकती है। महिला आरक्षण अब सिर्फ संवैधानिक मुद्दा नहीं रहा — यह सीधे चुनावी हथियार बन चुका है। दोनों तरफ से।
