थाने की सीढ़ियाँ चढ़ते वक्त हाथ में FIR की अर्जी हो या तहसील के दफ्तर में ज़मीन का काम — बिना ‘चाय-पानी’ के फाइल हिलती नहीं। यह 2014 से पहले की बात नहीं है। यह 2024 की तस्वीर है।
एक दशक पहले जब देश की जनता ने भारी तादाद में वोट डाले थे, तो वो किसी एक चेहरे की जीत नहीं थी। वो एक उम्मीद की जीत थी — भ्रष्टाचार-मुक्त व्यवस्था, जवाबदेह सरकार और सादगी की राजनीति की उम्मीद। दस साल बाद उस उम्मीद का क्या हुआ, यह सवाल हर उस आम नागरिक के मन में है जो रोज़ इसी ‘सिस्टम’ से टकराता है।
नारे मंच पर रहे, ज़मीन पर कुछ और हुआ
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मंच से नेता जब ‘गरीब’, ‘ईमानदारी’ और ‘सेवा’ की बात करता है, तो तालियाँ गूँजती हैं। लेकिन मंच से उतरते ही गाड़ियों का काफिला, Z+ सुरक्षा और वैभव का खुला प्रदर्शन शुरू हो जाता है। यह विरोधाभास कोई नया नहीं — लेकिन दशक दर दशक यह और गहरा होता जा रहा है।
गाँव का ब्लॉक ऑफिस हो, शहर का सरकारी अस्पताल हो या कोई भी सरकारी दफ्तर — काम के ‘रेट’ अभी भी तय हैं। सत्ता के रंग बदलते हैं, बस। व्यवस्था वही रहती है।
जिस राजनीति को कभी ‘सेवा का माध्यम’ कहा जाता था, वह अब एक पूरा कारोबार बन चुकी है। समझना हो तो सीधा हिसाब है —
- चुनाव = निवेश
- पद = लाइसेंस
- सत्ता = कमाई का अवसर
यह cynicism नहीं है। यह उन लोगों की observation है जो इस system के भीतर रहकर इसे रोज़ देखते हैं।
भ्रष्टाचार मिटाने वाले और भ्रष्टाचार — दोनों साथ चले
सबसे बड़ा विरोधाभास यह रहा कि जिन्होंने भ्रष्टाचार खत्म करने का वादा किया, उनके इर्द-गिर्द वही चेहरे दिखे जो पहले ‘भ्रष्ट व्यवस्था’ के प्रतीक माने जाते थे। बस कपड़े बदल गए, दल बदल गया — लेकिन उनका रोल नहीं बदला।
एक वरिष्ठ पत्रकार ने एक बार कहा था — “इस देश में दलबदल कानून है, लेकिन भ्रष्टाचारी-बदल की कोई रोक नहीं।”
बात सोचने वाली है।
विपक्ष की भूमिका — सड़क छोड़ी, स्टूडियो पकड़ा
विपक्ष का काम था जनता की तकलीफों को सत्ता के सामने रखना। लेकिन जो हुआ वो यह था कि विपक्ष या तो ‘सौदेबाज़ी’ में उलझा रहा या फिर TV की बहसों में बयानबाज़ी को ही अपना ‘संघर्ष’ मान बैठा। सड़क पर जनता अकेली रही।
महंगाई बढ़ी। बेरोज़गारी के आँकड़े बोलते रहे। लेकिन असली जवाबदेही के सवाल कहीं खो गए।
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मीडिया — चौथे स्तंभ का चौथा नंबर पर जाना
मीडिया की बात करें तो यह स्थिति और असहज करने वाली है। जिस press को सत्ता से सवाल पूछने थे, उसका एक बड़ा हिस्सा सत्ता के वैभव को ‘विकास’ बताता रहा। Breaking news में नेताओं की रैलियाँ, शिलान्यास और उद्घाटन छाए रहे — और आम आदमी की तकलीफ ‘scroll’ में दब गई।
“जब तक मीडिया सत्ता का प्रचारक बना रहेगा, लोकतंत्र का असली पहरेदार कौन होगा?” — यह सवाल हर उस नागरिक के मन में है जो सच में जानना चाहता है।
आम नागरिक — सबसे ज़्यादा चुकाता है, सबसे कम पूछता है
आम आदमी की स्थिति सबसे विचित्र है। वह income tax देता है। GST देता है। Toll देता है। और फिर उसी सरकारी अस्पताल में दवाई के लिए भटकता है जहाँ डॉक्टर नहीं आता। उसी थाने में न्याय माँगता है जहाँ ‘व्यवस्था’ की अपनी कीमत है।
फिर भी — वो चुप रहता है।
शायद इसलिए कि उसे अगला चुनाव याद आ जाता है। अगला वादा याद आ जाता है।
यह किसी पार्टी की आलोचना नहीं है
यह ज़रूरी है कि साफ कह दिया जाए — यह लेख किसी एक दल के पक्ष या विरोध में नहीं है। यह उस सच्चाई की बात है जो हर पार्टी की सरकार में, हर राज्य में, हर दशक में एक जैसी रही है।
समस्या नेता का चेहरा नहीं है। समस्या उस ढाँचे की है जो हर नेता को वही बना देता है जो पहले वाला था।
अगर सच में बदलाव चाहिए — और लाखों लोग चाहते हैं — तो रास्ता नारों से नहीं, जवाबदेही से निकलेगा। सादगी से निकलेगा। और उस नागरिक जागरूकता से निकलेगा जो हर पाँच साल में नहीं, हर दिन ज़रूरी है।
चुप्पी भी एक choice है — और इस व्यवस्था को वही choice सबसे ज़्यादा सूट करती है।
