कोलकाता की गलियों में जहाँ एक तरफ दुर्गा पूजा की धूम है, वहीं सियासी पंडित एक और लड़ाई की तैयारी में हैं। पश्चिम बंगाल — वो राज्य जहाँ BJP ने 2021 में 77 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया था, लेकिन ममता बनर्जी की TMC ने 213 सीटें लेकर जवाब भी दे दिया था। अब 2026 के विधानसभा चुनावों की आहट सुनाई दे रही है और BJP ने अपना सबसे बड़ा ‘ट्रंप कार्ड’ मैदान में उतारने का मन बना लिया है — उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ।
योगी का बंगाल दौरा — सिर्फ रैली नहीं, रणनीति
पिछले कुछ महीनों में योगी आदित्यनाथ ने बंगाल में कई बार दस्तक दी है। मालदा, कूचबिहार, पुरुलिया — हर जगह उनकी सभाओं में भीड़ जुटी। लेकिन बात सिर्फ भीड़ की नहीं है। भीड़ तो ममता की रैलियों में भी होती है।
योगी का असल काम है — BJP के हिंदू voter base को consolidate करना। बंगाल में हिंदू मतदाता करीब 70 फीसदी हैं। 2021 में यह base बिखरा हुआ था। इस बार BJP की कोशिश है कि योगी का ‘aggressive Hindu identity politics’ वाला image इस base को एकजुट करे।
“बंगाल की माटी राम की माटी है” — यह नारा योगी ने एक रैली में दिया और देखते ही देखते यह viral हो गया। BJP कार्यकर्ताओं ने इसे अपना anthem बना लिया।
ममता का पलटवार — ‘बाहरी’ का ठप्पा
TMC ने योगी के बंगाल दौरों को ‘बाहरी नेता की दखलंदाजी’ बताया है। ममता बनर्जी खुद कहती हैं — “यूपी वाले आकर बंगाल को क्या सिखाएंगे? हमारी संस्कृति, हमारी भाषा, हमारा इतिहास अलग है।”
TMC का यह angle काम भी करता है। बंगाली अस्मिता — ‘बांग्ला nijer maa’ वाला sentiment — बहुत गहरा है। 2021 में भी यही ‘बाहरी बनाम अपना’ narrative ममता के काम आया था। PM Modi, Amit Shah, और दर्जनों केंद्रीय नेताओं की रैलियाँ TMC के इस counter-narrative को नहीं तोड़ पाई थीं।
लेकिन इस बार BJP की रणनीति थोड़ी अलग है।
इस बार क्या बदला है?
सिर्फ योगी को नहीं, BJP पूरी तरह ‘ground-up’ approach अपना रही है। बूथ-लेवल पर काम, स्थानीय चेहरों को आगे करना, और Sandeshkhali जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाना — यह सब उसी रणनीति का हिस्सा है।
Sandeshkhali विवाद ने BJP को एक बड़ा हथियार दिया। महिलाओं पर अत्याचार के आरोपों को लेकर योगी ने खुद संसद से लेकर सड़क तक आवाज उठाई। “बंगाल में कानून नहीं, सिर्फ TMC का राज है” — यह message उन्होंने हर मंच पर दोहराया।
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बंगाल BJP के एक वरिष्ठ नेता ने बताया — “योगी जी की सभाओं में महिलाएं बड़ी संख्या में आती हैं। यह हमारे लिए encouraging है। 2021 में हम महिला voters को नहीं जोड़ पाए थे।”
Hindu Consolidation बनाम Bengali Identity
यह टकराव ही असल मुद्दा है।
योगी की राजनीति का core है — हिंदू एकता। वे Ram Navami जुलूस हों या Eid के बाद की हिंसा, हर मुद्दे पर आक्रामक हिंदू identity की बात करते हैं। बंगाल में, जहाँ 2022 और 2023 में कई बार सांप्रदायिक तनाव हुआ, यह narrative resonance करता है — खासकर बॉर्डर जिलों में जहाँ demographic बदलाव एक बड़ा concern है।
दूसरी तरफ ममता का दाँव है — Bengali pride। रवींद्रनाथ, नेताजी, बंगाली renaissance — यह सब उनके narrative का हिस्सा है। और इसमें हिंदू-मुस्लिम दोनों fit होते हैं।
राजनीतिक विश्लेषक Mainak Bose कहते हैं — “बंगाल में Hindu voter एक monolith नहीं है। उच्च जाति, OBC, SC — सबके अलग-अलग interests हैं। योगी का model UP में काम किया क्योंकि वहाँ Matua, Namasudra जैसे communities को BJP से directly जोड़ा गया। बंगाल में वही काम दोहराना आसान नहीं।”
नंदीग्राम की यादें और 2026 का हिसाब
2021 में नंदीग्राम से ममता की हार — उसी सीट से जहाँ उनका सियासी सफर शुरू हुआ था — ने BJP को उम्मीद दी थी। लेकिन overall चुनाव में वो उम्मीद टूट गई।
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2026 में BJP जानती है कि सिर्फ योगी की star power काफी नहीं होगी। उसे एक strong local narrative, एक credible CM face, और grass-root organization चाहिए। इन तीनों मोर्चों पर अभी भी काम बाकी है।
योगी बंगाल में campaign करते रहेंगे — यह तय है। लेकिन क्या वो UP की तरह बंगाल को भी ‘सियासी प्रयोगशाला’ बना पाएंगे? यह सवाल अभी खुला है। जवाब 2026 में मिलेगा।
