संजय निषाद का बड़ा बयान: ‘बीजेपी दरवाजे बंद करे तो सपा के साथ जाएंगे’
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जब भी गठबंधन का खेल शुरू होता है, तो छोटे दल अचानक बड़े किरदार बन जाते हैं। और इस बार किरदार हैं निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद — जिनके एक बयान ने लखनऊ से दिल्ली तक सियासी हलचल मचा दी है।
2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को अभी दो साल से ज्यादा का वक्त है, लेकिन गठबंधन की बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है। इसी बिसात पर संजय निषाद ने एक ऐसा दाव खेला है जिसने सबको चौंका दिया।
‘बंद दरवाजे’ वाला बयान — क्या कहा संजय निषाद ने?
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जब एक मीडिया इंटरव्यू में संजय निषाद से सीधा सवाल पूछा गया कि क्या वे 2027 में समाजवादी पार्टी के साथ जा सकते हैं, तो उनका जवाब सुनकर पत्रकार भी एक पल के लिए ठहर गए।
“जब बीजेपी अपने दरवाजे बंद कर ले, तो हमारे पास और क्या रास्ता बचेगा?”
यह महज एक जवाब नहीं था — यह एक संदेश था। बीजेपी के लिए भी, सपा के लिए भी, और उत्तर प्रदेश की उस निषाद बिरादरी के लिए भी जो करीब दो करोड़ वोटों की ताकत रखती है।
निषाद पार्टी का वजन — क्यों हर दल चाहता है साथ?
उत्तर प्रदेश में निषाद, मल्लाह, केवट और बिंद समुदाय की आबादी पूर्वांचल से लेकर अवध तक फैली हुई है। पूर्वी उत्तर प्रदेश की कम से कम 40-50 विधानसभा सीटों पर इस समुदाय का सीधा असर माना जाता है। यही कारण है कि 2017 में बीजेपी ने संजय निषाद को अपने पाले में खींचा और 2022 में भी यह गठबंधन बरकरार रहा।
लेकिन राजनीति में वफादारी की उम्र अक्सर छोटी होती है। संजय निषाद के हालिया बयान यह साफ कर रहे हैं कि वे अपनी कीमत जानते हैं — और वे चाहते हैं कि बीजेपी भी यह जाने।
बीजेपी से नाराजगी की असली वजह?
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सतह पर यह बयान भले ही सियासी लगे, लेकिन अंदर की बात कुछ और है। सूत्रों के मुताबिक, संजय निषाद लंबे समय से अपने बेटे प्रवीण निषाद के लिए बड़ी राजनीतिक हिस्सेदारी की मांग कर रहे हैं। प्रवीण निषाद संत कबीर नगर से सांसद हैं, लेकिन पार्टी के भीतर उनकी पहुंच और प्रभाव को लेकर कई बार असंतोष की खबरें आई हैं।
इसके अलावा, मछुआरा समुदाय से जुड़े कई मुद्दे — जैसे नदियों में मछली पकड़ने के अधिकार, सरकारी योजनाओं में हिस्सेदारी और आरक्षण का लाभ — वे मुद्दे हैं जिन पर संजय निषाद का कहना है कि उनकी बात पूरी तरह नहीं सुनी जाती।
सपा का रुख — अखिलेश चुप क्यों हैं?
दिलचस्प बात यह है कि अखिलेश यादव ने इस पर कोई सीधी प्रतिक्रिया नहीं दी। और यह चुप्पी खुद एक राजनीतिक बयान है। सपा जानती है कि अगर निषाद पार्टी उनके साथ आती है, तो 2027 में गेम बदल सकता है। 2022 में सपा को मिली हार के पीछे एक बड़ा कारण पूर्वांचल में पिछड़े और अति-पिछड़े समुदायों का बीजेपी की तरफ झुकाव था।
ऐसे में संजय निषाद का ‘दरवाजे बंद होने’ वाला बयान सपा के लिए एक खुला निमंत्रण जैसा है — भले ही शब्दों में वह निमंत्रण न दिखे।
2027 की बिसात — कौन किसके साथ?
उत्तर प्रदेश का चुनावी इतिहास गवाह है कि यहां गठबंधन रात भर में बनते और टूटते हैं। 2019 में सपा-बसपा का महागठबंधन बना और 2022 तक टूट गया। ऐसे में संजय निषाद का यह बयान एक संकेत है कि 2027 से पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई और उलटफेर होने वाले हैं।
बीजेपी के लिए यह एक अलार्म है कि सहयोगी दलों को हल्के में लेना महंगा पड़ सकता है। और सपा के लिए यह एक अवसर है कि वे अपनी सामाजिक इंजीनियरिंग को नए सिरे से खड़ा करें।
संजय निषाद का यह बयान महज एक इंटरव्यू का हिस्सा नहीं है — यह उत्तर प्रदेश की उस राजनीतिक संस्कृति का आईना है जहां हर छोटा दल बड़े दल को यह याद दिलाता रहता है कि सत्ता का रास्ता उनके दरवाजे से होकर गुजरता है।
