वो एक नाम जो बिहार की राजनीति को थामे हुए है
पटना की सड़कों पर जब भी राजनीतिक चर्चा छिड़ती है, एक सवाल जरूर उठता है — ‘नीतीश के बाद क्या?’ यह सवाल अब सिर्फ चाय की दुकानों तक सीमित नहीं रहा। बिहार के सियासी गलियारों में यह फुसफुसाहट धीरे-धीरे एक बड़ी बहस का रूप लेती जा रही है। नीतीश कुमार — वो नाम जो पिछले दो दशकों से बिहार की राजनीति का केंद्र बिंदु रहा है। लेकिन जब यह केंद्र बिंदु हटेगा, तो जो शून्य बचेगा, उसे कौन भरेगा और किस तरह भरेगा — यही असली सवाल है।
90 का दशक: जब बिहार धधकता था
जो लोग 1990 के दशक में बिहार में थे, वो उस दौर को भूले नहीं हैं। एक तरफ लालू प्रसाद यादव की पिछड़ा-दलित राजनीति का उफान था, दूसरी तरफ भाजपा का हिंदुत्व का ज्वार। बीच में अगड़ी जातियां — भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण — अपनी पहचान और सत्ता की तलाश में थीं। रणवीर सेना और बाथे, लक्ष्मणपुर-बाथे जैसे नरसंहार उसी राजनीतिक तनाव की उपज थे। जातीय समीकरण और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण — ये दो धाराएं बिहार की राजनीति को चीरती थीं।
नीतीश कुमार ने 2005 में जब सत्ता संभाली, तो उन्होंने इस समीकरण को एक नई धुरी दी — ‘सुशासन’। विकास की राजनीति, कानून-व्यवस्था, और ‘अति-पिछड़ा’ वर्ग को साधने की कोशिश। यह एक नई सामाजिक इंजीनियरिंग थी जिसने बिहार को बदल दिया।
नीतीश की विरासत और उनके जाने का खतरा
सियासी विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार एक ‘बैलेंसिंग फोर्स’ की तरह काम करते रहे हैं। उनके रहते भाजपा का कट्टर हिंदुत्व एजेंडा बिहार में उस तरह हावी नहीं हो सका, जैसा उत्तर प्रदेश में हुआ। साथ ही, लालू की जाति-आधारित राजनीति को भी वो काउंटर करते रहे।
लेकिन जब नीतीश नहीं रहेंगे — चाहे वो सत्ता छोड़ें, रिटायर हों, या राष्ट्रीय राजनीति में जाएं — तो JDU का यह ‘मध्यमार्गी’ ढांचा किस तरह टिकेगा? पटना के एक वरिष्ठ पत्रकार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया — “नीतीश की पार्टी नीतीश के बिना कुछ भी नहीं है। उनके जाते ही JDU या तो BJP में मिल जाएगी या बिखर जाएगी।”
अगड़ा-पिछड़ा बनाम हिंदुत्व: नई लकीरें खिंच रही हैं
बिहार की जनसंख्या का ताना-बाना बेहद जटिल है। यादव और मुस्लिम मिलकर करीब 30 प्रतिशत हैं — यह राजद का पारंपरिक वोट बैंक। कुर्मी-कोइरी गठजोड़ नीतीश की ताकत रहा। भूमिहार, राजपूत और ब्राह्मण यानी अगड़ी जातियां लंबे समय से भाजपा की ओर झुकी रही हैं। लेकिन अब समीकरण बदल रहे हैं।
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एक तरफ तेजस्वी यादव लगातार ‘पिछड़ा बनाम अगड़ा’ की लकीर खींचने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी तरफ भाजपा हिंदुत्व के मुद्दों पर जाति के ऊपर एक नई पहचान बनाने की कोशिश में है। इन दोनों के बीच जो वर्ग है — अति-पिछड़े, महादलित — वो अभी भी नीतीश के साथ खड़े हैं। लेकिन नीतीश के बाद यह वर्ग किसके साथ जाएगा?
तेजस्वी और भाजपा: दो धाराएं, एक मैदान
तेजस्वी यादव ने 2020 और 2024 के चुनावों में यह साबित किया है कि वो सिर्फ लालू की छाया नहीं हैं। उन्होंने बेरोजगारी का मुद्दा उठाया, युवाओं से जुड़े। लेकिन उनकी पार्टी का कोर वोट बैंक अभी भी जातीय पहचान पर टिका है। जब नीतीश नहीं रहेंगे, तो तेजस्वी के लिए ‘MY समीकरण’ से आगे जाने का प्रलोभन और बड़ा होगा।
भाजपा की रणनीति अलग है। वो चाहती है कि बिहार में भी UP जैसा हिंदुत्व-आधारित ध्रुवीकरण हो। लेकिन बिहार में मुसलमान करीब 17 प्रतिशत हैं और वो एकजुट होकर वोट देते हैं। इसलिए हिंदुत्व कार्ड खेलना यहां उतना आसान नहीं जितना UP में था।
“बिहार की राजनीति अपनी अलग रवायत रखती है,” वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक श्याम नारायण सिंह कहते हैं, “यहां हिंदुत्व और जाति दोनों साथ-साथ चलते हैं, लेकिन कोई एक दूसरे को पूरी तरह खत्म नहीं कर पाया।”
इतिहास की परछाईं और भविष्य की आहट
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जब भी बिहार में सत्ता का शून्य बना है, उसे भरने के लिए जाति और धर्म दोनों ने होड़ लगाई है। 1990 के दशक में मंडल बनाम कमंडल की लड़ाई ने देश की राजनीति की दिशा तय की थी। आज, तीन दशक बाद, वही सवाल नए रूप में खड़ा है।
नीतीश कुमार के बाद बिहार में जो राजनीतिक पुनर्गठन होगा, वो सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रहेगा। यह 2029 के लोकसभा चुनावों की दिशा भी तय करेगा। 40 सीटों वाला बिहार राष्ट्रीय राजनीति में हमेशा से निर्णायक रहा है। इसलिए यह सवाल सिर्फ पटना का नहीं, दिल्ली का भी है — नीतीश के बाद बिहार कहां जाएगा?
