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उच्च शिक्षा संस्थान: विषमता के टापू बनते जा रहे हैं हमारे विश्वविद्यालय

भारत के उच्च शिक्षा संस्थान और विश्वविद्यालय इन दिनों सुर्खियों में हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के हालिया आदेश ने एक नई बहस छेड़ दी है। लेकिन इस बहस के पीछे शिक्षा क्षेत्र की गहरी विकृति...

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केंद्रीय संपादकीय डेस्क • गुरुवार, 29 जनवरी 2026 | 12:30 PM

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उच्च शिक्षा संस्थान: विषमता के टापू बनते जा रहे हैं हमारे विश्वविद्यालय
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भारत के उच्च शिक्षा संस्थान और विश्वविद्यालय इन दिनों सुर्खियों में हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के हालिया आदेश ने एक नई बहस छेड़ दी है। लेकिन इस बहस के पीछे शिक्षा क्षेत्र की गहरी विकृतियां छिपाने का खेल चल रहा है। देश में ऐसे लोग कम नहीं हैं जो यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं, जहां उच्च शिक्षा केवल विशेष वर्गों तक सीमित रहे। आज के दौर में धनाढ्य राजनेताओं और नौकरशाहों के बच्चे विदेशों में पढ़ाई कर रहे हैं—चाहे वे सवर्ण हों, पिछड़े वर्ग के हों या कमजोर तबके के। उन्हें देश की शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं है। परिणामस्वरूप, हमारे उच्च शिक्षा संस्थान विषमता के टापू बनते जा रहे हैं, जहां सामाजिक न्याय और समानता की कोई जगह नहीं दिखती।

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उच्च शिक्षा में बढ़ती असमानता

यदि हम ध्यान से देखें तो प्राथमिक से माध्यमिक शिक्षा (कक्षा 1 से 12 तक) में कमजोर वर्गों के बच्चे बहुसंख्यक होते हैं। लेकिन जैसे-जैसे वे उच्च कक्षाओं की ओर बढ़ते हैं, ड्रॉपआउट दर तेजी से बढ़ जाती है। बहुत कम बच्चे उच्च शिक्षा तक पहुंच पाते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के आंकड़ों के अनुसार, अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के छात्रों का ड्रॉपआउट रेट ग्रेजुएशन स्तर पर 20-30% तक पहुंच जाता है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए यह और भी चुनौतीपूर्ण है, जहां ट्यूशन फीस, हॉस्टल खर्च और अन्य जरूरतें उन्हें पीछे धकेल देती हैं।

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पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह के कार्यकाल (2004-2009) में ओबीसी आरक्षण जैसे बड़े कदम उठाए गए थे, लेकिन उनका विरोध किसने किया? मुख्य रूप से वे लोग जो विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग से आते थे। आज दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) जैसे संस्थानों में पाठ्यक्रम में बदलाव हो रहे हैं, जहां कुछ विवादास्पद ग्रंथों को शामिल किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, हाल ही में डीयू के सिलेबस में रामायण और महाभारत जैसे क्लासिकल टेक्स्ट पर बहस छिड़ी है, लेकिन क्या ये बदलाव वास्तव में समावेशी हैं या सिर्फ दिखावा?

शिक्षकों और प्रबंधन में वर्गीय

उच्च शिक्षा संस्थानों में शिक्षक और प्रबंधन से जुड़े अधिकांश जिम्मेदार पदों पर कौन लोग काबिज हैं? यह सबको पता है—मुख्य रूप से सवर्ण और विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग। पिछले दशकों में कई पदों पर नियुक्तियां एक अपंजीकृत संस्था की सिफारिश पर हुईं, जो पारदर्शिता की कमी को दर्शाती है। जब रिक्तियां निकलती हैं, तो पिछड़े और कमजोर वर्गों के उम्मीदवारों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) की रिपोर्ट्स बताती हैं कि 2023-2025 के बीच केंद्रीय विश्वविद्यालयों में ओबीसी और एससी/एसटी के लिए आरक्षित पदों में से 40% से अधिक खाली पड़े हैं।

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कैंपस अब असमानता के टापू ही नहीं, बल्कि सांप्रदायिक उन्माद के केंद्र भी बन गए हैं। जेएनयू, जामिया मिलिया इस्लामिया और एएमयू जैसे संस्थानों में हाल के वर्षों में जातीय और धार्मिक तनाव बढ़े हैं, जो शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहे हैं। यूजीसी की हैसियत आज क्या है? उनके परिपत्र अक्सर कागजी साबित होते हैं, और उनका हश्र चंद महीनों में स्पष्ट हो जाता है।

वर्तमान विवाद और मीडिया की भूमिका

हालिया विवाद—जिसमें यूजीसी के आदेश पर बहस छिड़ी है—ने कई लोगों को आंदोलित कर दिया है। टीवी चैनल और यूट्यूब इस आग को हवा दे रहे हैं, लेकिन असली मुद्दे पीछे छूट रहे हैं। क्या हम शिक्षा में समता और सामाजिक न्याय की बात कर रहे हैं? या सिर्फ सतही बहस? विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद पानी पर लाठी पीटने जैसा है—बिना किसी ठोस परिणाम के।

शिक्षा क्षेत्र में सुधार की जरूरत है। एनईपी 2020 में मल्टीडिसिप्लिनरी एजुकेशन और इक्विटी पर जोर दिया गया है, लेकिन क्रियान्वयन कमजोर है। सरकार को चाहिए कि आरक्षण नीतियों को सख्ती से लागू करे, छात्रवृत्तियां बढ़ाए और कैंपस में विविधता सुनिश्चित करे। अन्यथा, उच्च शिक्षा केवल अमीरों और विशेषाधिकार प्राप्तों का खेल मैदान बनी रहेगी।

निष्कर्ष

आखिर कौन चाहता है कि शिक्षा क्षेत्र समता और सामाजिक न्याय का केंद्र बने? जब तक नीति-निर्माता और समाज खुद जागरूक नहीं होंगे, तब तक बदलाव मुश्किल है। हमें जरूरत है एक ऐसी व्यवस्था की जहां हर वर्ग के बच्चे बराबरी से आगे बढ़ सकें। उच्च शिक्षा को विषमता के टापू से बाहर निकालना होगा, ताकि यह राष्ट्र निर्माण का सच्चा आधार बने।

लेखक: राम भुवन सिंह

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