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यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक: कहीं जश्न तो कहीं मायूसी, दिल्ली में बुद्धिजीवियों ने जताई चिंता

नई दिल्ली | देश की पत्रिका ब्यूरो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा अंतरिम रोक लगाए जाने के बाद देश के शैक्षणिक जगत में बहस छिड़ गई है। जहां एक पक्ष इसे छात्रों...

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केंद्रीय संपादकीय डेस्क • शुक्रवार, 30 जनवरी 2026 | 06:35 PM

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यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक: कहीं जश्न तो कहीं मायूसी, दिल्ली में बुद्धिजीवियों ने जताई चिंता
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नई दिल्ली | देश की पत्रिका ब्यूरो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा अंतरिम रोक लगाए जाने के बाद देश के शैक्षणिक जगत में बहस छिड़ गई है। जहां एक पक्ष इसे छात्रों की बड़ी जीत मानकर जश्न मना रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे शिक्षा सुधार की दिशा में एक बड़ा अवरोध मानकर मायूसी व्यक्त कर रहा है।

इसी गरमाते माहौल के बीच, राजधानी के राजौरी गार्डन में वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र प्रताप सिंह की मौजूदगी में एक विशेष परिचर्चा आयोजित की गई। इस चर्चा में 'अखंड राजपूताना सेवा संघ' के पदाधिकारियों सहित शिक्षाविदों ने यूजीसी के नए रेगुलेशन के दूरगामी प्रभावों पर अपने विचार रखे।

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'सवर्णों की अनदेखी और भेदभाव का डर'

परिचर्चा में अखंड राजपूताना सेवा संघ (दिल्ली प्रदेश) के अध्यक्ष केशव प्रसाद सिंह (केपी सिंह) ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, "यूजीसी का यह नया रेगुलेशन पूरी तरह से भेदभावपूर्ण है। इस नए बिल में सवर्णों की आवाज अनसुनी की जा रही है। यदि कोई गलत करता है तो उस पर कार्रवाई हो, लेकिन सही व्यक्ति को गलत तरीके से फंसाना भी अपराध है। इस कानून में तत्काल संशोधन की आवश्यकता है।"

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संघ के प्रदेश महामंत्री राम नारायण सिंह ने संतुलित दृष्टिकोण रखते हुए कहा कि कानून बनाना गलत नहीं है, लेकिन सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी एक वर्ग का उत्पीड़न रोकने के प्रयास में दूसरे का उत्पीड़न शुरू न हो जाए। उन्होंने शिक्षाविदों और कानूनविदों से इस मामले में हस्तक्षेप की अपील की।

सामाजिक समरसता पर सवाल

आरएसएस प्रचारक और संघ के कोषाध्यक्ष केवल बहादुर सिंह ने चेतावनी दी कि यूजीसी के इन नियमों से समाज में विभाजन और भेदभाव बढ़ेगा। उन्होंने कहा, "सत्ता के लिए समाज को बांटना शायद राजनीति को रास आए, लेकिन प्रशासन और न्यायपालिका की यह जवाबदेही है कि वे वही फैसला लें जो समाज के सामूहिक हित में हो।" वहीं, पिछड़ा वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रही अंजू ने भी इसे भेदभावपूर्ण बताते हुए कहा कि इससे छात्रों के बीच खाई और गहरी होगी।
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शिक्षाविदों का नजरिया

डीपीएस स्कूल बहादुरगढ़ के कार्यकारी प्रधानाचार्य रमेश सिंह ने शिक्षा के मूल सिद्धांतों पर जोर देते हुए कहा, "एक शिक्षक के रूप में हम बच्चों के बीच समरसता और गुणवत्ता लाते हैं। हमारे लिए छात्र की जाति (ओबीसी, एससी, एसटी या सवर्ण) मायने नहीं रखती, बल्कि उसे अच्छी शिक्षा देना हमारा प्राथमिक लक्ष्य है। सरकार को ऐसा कोई भी कानून नहीं बनाना चाहिए जो समाज में विघटन पैदा करे।"

भविष्य पर मंडराता खतरा

परिचर्चा में शामिल विशेषज्ञों का साझा निष्कर्ष था कि यूजीसी के इन नए नियमों से:

  • विश्वविद्यालयों की प्रवेश प्रक्रिया जटिल होगी।
  • आरक्षण व्यवस्था और पाठ्यक्रम संरचना पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
  • लाखों छात्रों का भविष्य अनिश्चितता की ओर बढ़ सकता है।

फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट की रोक ने इस विवाद को एक नया मोड़ दे दिया है, लेकिन शैक्षणिक गलियारों में इसके पक्ष और विपक्ष में दलीलें जारी हैं।

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देश की पत्रिका की आधिकारिक संपादकीय एवं रिपोर्टिंग टीम।