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Tuesday, 23 Jun 2026

जातिगत राजनीति से ऊपर उठें, संगठन-सरकार समन्वय बनाएं: केपी सिंह का भाजपा को सलाह, 2027 चुनाव पर चेतावनी

लखनऊ, 1 जनवरी 2026: उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण विधायकों की बैठक को लेकर छिड़ा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। भाजपा के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने ऐसी बैठकों पर आपत्ति जताई और सख्त चेतावनी दी, जिससे पार्टी के अंदर असंतोष की लहर दौड़ गई है। इस बीच, अखंड राजपूताना सेवा संघ के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद सिंह (केपी सिंह) ने संगठन और राज्य सरकार के बीच समन्वय की अपील की है। उन्होंने जातिगत राजनीति को नुकसानदेह बताते हुए कहा कि यदि आपसी वाद-विवाद जारी रहा, तो आगामी 2027 यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा और सनातन समाज दोनों को भारी नुकसान हो सकता है।

ब्राह्मण बैठक विवाद: पंकज चौधरी की नसीहत से बिफरा संगठन

विधानसभा सत्र के दौरान ब्राह्मण विधायकों की बैठक ने सुर्खियां बटोरीं। पंकज चौधरी ने इसे अस्वीकार्य बताते हुए कहा कि ऐसी जाति-आधारित गतिविधियां पार्टी की एकता को कमजोर करती हैं। उनके बयान के बाद कई भाजपा नेता नाराज बताए जा रहे हैं। विपक्षी दल इस विवाद को भुनाने की फिराक में हैं, जबकि पार्टी आंतरिक कलह से जूझ रही है।

केपी सिंह ने एक बयान में कहा, “संगठन और सरकार का समन्वय भाजपा और सनातन के लिए अनिवार्य है। सरकार को संगठन के क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। वरना, वाद-विवाद का फायदा विरोधी उठा लेंगे।” उन्होंने एक रोचक उदाहरण देते हुए कहा, “बंदर के हाथ में अदरक मिल जाए तो उसे लगता है कि वह सबसे बड़ा वैद्य है।” यह टिप्पणी किसी विशेष व्यक्ति पर नहीं, बल्कि सामान्य परिस्थिति पर केंद्रित थी। सिंह ने अपील की कि जातिगत राजनीति से ऊपर उठकर सभी को एकजुट होकर काम करना चाहिए, ताकि सनातन समाज की समस्याओं का समाधान हो सके।

2027 चुनाव पर खतरा: केंद्र-राज्य समन्वय की मांग

केपी सिंह ने चेतावनी दी कि यदि यही माहौल रहा, तो 2027 के यूपी चुनाव में भाजपा की सत्ता पर असर पड़ेगा। उन्होंने कहा, “केंद्र और राज्य सरकार सनातन व भाजपा को बचाने के लिए एकजुट हैं। संगठन-सरकार की लड़ाई में नुकसान सबका होगा।” उन्होंने उन लोगों से दूर रहने की अपील की जो इस मुद्दे पर टिप्पणियां कर रहे हैं।

इस बीच, कुशीनगर विधायक पंचानंद पाठक (पीएन पाठक) ने ब्राह्मण समाज की भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “सनातन परंपरा में ब्राह्मण मार्गदर्शक, विचारक और संतुलनकर्ता होता है। जहां ब्राह्मण एकत्र होते हैं, वहां ज्ञान, विवेक और चिंतन का मंथन होता है, जो हिंदू अस्मिता को मजबूत बनाता है। उनका धर्म समाज को जोड़ना है, तोड़ना नहीं।” पाठक का बयान विवाद को शांत करने का प्रयास लगता है, जो जातिगत राजनीति से ऊपर उठकर सनातन और भाजपा को मजबूत करने पर केंद्रित है।

विपक्ष की नजर: सियासी फायदा उठाने की कोशिश

विपक्षी दल इस विवाद को सियासी हथियार बनाने की फिराक में हैं। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के नेता इसे भाजपा का आंतरिक संकट बता रहे हैं। एक एसपी प्रवक्ता ने कहा, “भाजपा खुद जातिवाद की आग में जल रही है। 2027 में इसका खामियाजा भुगतेगी।” राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद यदि नहीं सुलझा, तो भाजपा के वोट बैंक पर असर पड़ेगा।

भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन सूत्रों के अनुसार, संगठन स्तर पर मध्यस्थता की कोशिशें तेज हैं। केपी सिंह की अपील को पार्टी के कई धड़े सकारात्मक मान रहे हैं, जो समन्वय पर जोर देती है।

यह विवाद यूपी की राजनीति को नई दिशा दे सकता है। क्या भाजपा जातिगत तुष्टीकरण से ऊपर उठ पाएगी? या 2027 चुनाव इससे प्रभावित होंगे? आने वाले दिनों में साफ होगा।