दिल्ली की भागदौड़ भरी जिंदगी में, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर स्थित मालवीय स्मृति भवन में एक अलग तरह की बातचीत हो रही थी। देश के कोने-कोने से आए professors, researchers और policy thinkers एक ही सवाल पर माथापच्ची कर रहे थे — जब 2047 में भारत ‘विकसित’ होगा, तो उस तस्वीर में गाँव कहाँ खड़ा होगा?
यह कोई routine academic event नहीं था। यह एक जरूरी बातचीत थी।
RASA का यह आयोजन क्यों खास था
पंखा रोड नाली सफाई: दिल्ली सीएम रेखा गुप्ता ने लॉन्च की एंफिबियस मशीन, मानसून से पहले जलभराव रोकने की तैयारी
रॉयल एसोसिएशन फॉर साइंस लीड सोशियो कल्चरल एडवांसमेंट — यानी RASA — ने “विकसित भारत 2047 में कृषि एवं ग्रामीण विकास की भूमिका” विषय पर इस राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया। नाम थोड़ा लंबा है, लेकिन मकसद बिल्कुल साफ था — भारत के विकास की कहानी को उसकी जड़ों से जोड़कर देखना।
आज भी भारत की लगभग 65% आबादी किसी न किसी रूप में कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ी है। ऐसे में अगर 2047 का ‘विकसित भारत’ का सपना सिर्फ शहरी infrastructure और tech startups तक सिमटा रहा, तो वह सपना अधूरा ही रहेगा। यही बात इस सेमिनार को relevance देती है।
मंच पर कौन थे — और क्यों मायने रखता है
इस सेमिनार में जो नाम शामिल थे, वे सिर्फ designation के लिए नहीं आए थे।

अखंड राजपुताना सेवासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष और आज का कर्मवीर सोशल फाउंडेशन के चेयरमैन Dr. R.P. SINGH ने प्रमुख अतिथि और वक्ता के रूप में सेमिनार में हिस्सा लिया। उनका जुड़ाव सिर्फ संस्थागत नहीं, बल्कि grassroots स्तर पर काम करने का लंबा अनुभव लिए हुए था।
विद्वानों की फेहरिस्त भी कम प्रभावशाली नहीं थी:
- प्रोफेसर राणा प्रताप सिंह — बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ
- डॉ. ठाकुर RP.SINGH — इग्नू
- डॉ. हरिशंकर सिंह — एसोसिएट प्रोफेसर, थापर इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, पटियाला
- डॉ. आशुतोष गोस्वामी — एसोसिएट प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय
- प्रोफेसर पवनिश कुमार सिंह — इग्नू, दिल्ली
- डॉ. रौशन कुमार एवं डॉ. प्रियंका प्रदर्शनी — असिस्टेंट प्रोफेसर
लखनऊ से पटियाला, दिल्ली से इग्नू — इतने diverse academic backgrounds का एक ही मंच पर आना बताता है कि यह विषय किसी एक क्षेत्र या discipline तक नहीं बँधा।
चेयरमैन का संबोधन — जो बात दिल को छू गई

सेमिनार में चेयरमैन का भाषण महज एक formal address नहीं था। उन्होंने सीधे बात की।
उन्होंने कृषि और ग्रामीण विकास को आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला बताया — और यह कोई rhetorical statement नहीं था। उनका तर्क था कि जब तक गाँव की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होगी, शहरों की चमक टिकाऊ नहीं होगी।
“विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने में ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सुदृढ़ता अत्यंत आवश्यक है” — यह बात उन्होंने जोर देकर कही।
तीन बातें थीं जिन पर उन्होंने सबसे ज्यादा जोर दिया:
पहली — नवाचार। खेती में technology का इस्तेमाल अब luxury नहीं, जरूरत है। Drone से फसल की निगरानी हो, soil testing apps हों, या फिर digital मंडियाँ — innovation को गाँव तक पहुँचाना होगा।
दूसरी — सतत विकास। ऐसा विकास जो आने वाली पीढ़ियों के लिए जमीन, पानी और हवा को बचाकर रखे। जलवायु परिवर्तन का सबसे पहला और सबसे कठोर असर किसान पर पड़ता है — यह बात किसी से छुपी नहीं।
UP Development Blueprint 2026: योगी सरकार का मेगा प्लान – 114 Township, 95 हजार करोड़ का Job Mission और Semiconductor Hub
तीसरी — युवाओं की भागीदारी। गाँव छोड़कर शहर आने का सिलसिला तब रुकेगा जब गाँव में ही रोजगार, dignity और future दिखेगा। युवाओं को agriculture को एक career option की तरह देखना होगा, बोझ की तरह नहीं।
असली सवाल — 2047 तक क्या बदलना होगा
यह सेमिनार सिर्फ speeches का मंच नहीं था। Professors और researchers ने education, society और policy तीनों angles से बात की।
एक अहम सवाल था — क्या हमारी कृषि नीतियाँ वाकई किसान-केंद्रित हैं?
MSP की बात हो, irrigation infrastructure की बात हो, या cold storage chain की — जमीनी हकीकत और सरकारी कागजों के बीच का फासला आज भी बड़ा है। Academic circles में यह बात खुलकर कही जाती है, भले ही policy corridors में इसे स्वीकार करने में वक्त लगता हो।
दूसरा बड़ा मुद्दा था — ग्रामीण शिक्षा और skill development। खेती को profitable बनाने के लिए सिर्फ बीज और खाद नहीं चाहिए। चाहिए एक ऐसा किसान जो market को समझे, technology को adopt करे, और अपनी फसल की सही कीमत माँग सके।
इग्नू जैसे distance education institutions की भूमिका यहाँ बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है — जहाँ rural students बिना शहर आए higher education और vocational training ले सकते हैं।
सेमिनार का माहौल — academic लेकिन जमीन से जुड़ा
मालवीय स्मृति भवन का नाम ही एक संदेश देता है। महामना मदन मोहन मालवीय — जिन्होंने शिक्षा और समाजसेवा को अलग नहीं माना। उस भवन में यह बातचीत होना एक तरह की symbolic continuity थी।
कार्यक्रम का माहौल formal था, लेकिन rigid नहीं। Professors ने freely debate की, अलग-अलग perspectives सामने आए, और यही किसी भी अच्छे academic dialogue की पहचान होती है।
अंत में सभी विद्वान अतिथियों का सम्मान किया गया और आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया गया — लेकिन असली सम्मान तो उन ideas का था जो उस दिन उस कमरे में साझा हुए।
यह बातचीत यहीं नहीं रुकनी चाहिए
2047 अभी 22 साल दूर है। लेकिन बदलाव के लिए जो seeds आज बोए जाएँगे, वही फसल 2047 में काटी जाएगी।
नोएडा मेट्रो एक्वा लाइन का विस्तार: बोटैनिकल गार्डन से सेक्टर-142 तक 11.56 किमी नया कॉरिडोर, 4 साल में होगा पूरा
RASA जैसे organizations का काम सिर्फ seminars organize करना नहीं है — बल्कि एक ऐसा ecosystem तैयार करना है जहाँ ideas को action में बदला जा सके। जहाँ professors की research सिर्फ journals में न बंद रहे, बल्कि policy makers तक पहुँचे। जहाँ चेयरमैन और grassroots workers की बात academic circles में सुनी जाए।
भारत का गाँव आज भी धैर्यवान है। वह इंतजार कर सकता है। लेकिन 2047 का विकसित भारत उस गाँव को और इंतजार नहीं करा सकता।
