हर साल अप्रैल आता है और दिल्ली के लाखों अभिभावकों की जेब पर एक जाना-पहचाना बोझ आ गिरता है। स्कूल बैग, यूनिफॉर्म, किताबें, स्टेशनरी — और ये सब सिर्फ उसी दुकान से जो स्कूल ने ‘suggest’ की हो। सुझाव के नाम पर असल में एक बंधन। लेकिन इस बार दिल्ली की मुख्यमंत्री Rekha Gupta ने साफ कह दिया है — बहुत हुआ।
अभिभावकों की पुरानी तकलीफ, नई सरकार का सख्त रुख
दिल्ली में प्राइवेट स्कूलों की मनमानी कोई नई बात नहीं है। सालों से यह चलता आया है — स्कूल तय करते हैं कि किताबें कहाँ से आएंगी, ड्रेस किस दुकान से सिलेगी, और स्टेशनरी का ब्रांड क्या होगा। उस खास दुकान पर वही चीज़ दोगुने-तिगुने दाम पर मिलती है। अभिभावक जानते हैं, समझते हैं — फिर भी चुप रहते हैं, क्योंकि बच्चे का दाखिला दांव पर होता है।
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CM Rekha Gupta ने इस पूरे सिस्टम पर सीधे निशाना साधते हुए कहा, “प्राइवेट स्कूल अभिभावकों को किसी एक दुकान से किताबें या यूनिफॉर्म खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। माता-पिता को यह आजादी है कि वे जहाँ चाहें, वहाँ से खरीदारी करें।”
यह बयान सिर्फ बयान नहीं है। इसके पीछे एक पूरा एक्शन प्लान बताया जा रहा है।
क्या है असल समस्या?
दिल्ली में करीब 1,700 से ज्यादा प्राइवेट स्कूल हैं। इनमें से बड़ी संख्या में स्कूल हर साल नई किताबें syllabus में जोड़ते हैं — भले ही पुरानी किताबें काम की हों। नया edition, नया publisher, और उसी से जुड़ी एक ‘authorized’ दुकान।
एक अभिभावक रमेश वर्मा, जिनका बेटा साउथ दिल्ली के एक नामी प्राइवेट स्कूल में पढ़ता है, बताते हैं — “पिछले साल हमें school के बाहर वाली दुकान से ही किताबें लेनी पड़ीं। बाज़ार में वही किताब 180 रुपये में मिल रही थी, वहाँ 320 में दी गई। विरोध किया तो class teacher ने घुमा-फिराकर समझाया कि ‘यही proper edition है।'”
यूनिफॉर्म का हाल और भी बुरा है। स्कूल का logo, खास रंग, खास कपड़ा — सब कुछ सिर्फ एक ही जगह मिलता है। और वहाँ कीमत तय करने वाला कोई नहीं।
सरकार क्या करने वाली है?
CM Rekha Gupta के निर्देश के बाद दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग ने संकेत दिए हैं कि जल्द ही एक formal circular जारी किया जाएगा। इसमें साफ लिखा जाएगा कि कोई भी प्राइवेट स्कूल —
- किसी एक दुकान से खरीदारी के लिए अभिभावकों पर दबाव नहीं डाल सकता
- हर साल बिना वजह नई किताबें नहीं थोप सकता
- फीस के अलावा किसी भी मद में जबरन वसूली नहीं कर सकता
साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि शिकायत के लिए एक dedicated helpline या portal भी शुरू हो सकता है, ताकि अभिभावक सीधे सरकार तक अपनी बात पहुँचा सकें।
पहले भी बने हैं नियम, लागू कितने हुए?
यहाँ एक ज़रूरी सवाल है जो हर जागरूक अभिभावक के मन में उठता है — यह पहली बार नहीं है जब ऐसे निर्देश दिए गए हों।
साल 2017 में भी दिल्ली हाईकोर्ट ने स्कूलों को किताब-ड्रेस के मामले में मनमानी से रोका था। CBSE भी समय-समय पर guidelines जारी करता रहा है। लेकिन ज़मीन पर बदलाव? बहुत कम।
इसीलिए इस बार असली परीक्षा implementation की है। अगर सरकार सिर्फ बयान देकर रुक गई, तो यह भी पुरानी files में दफन हो जाएगा। लेकिन अगर नियम सख्ती से लागू हुए और उल्लंघन पर कार्रवाई हुई — तो यह वाकई एक बड़ा बदलाव होगा।
अभिभावकों में उम्मीद, थोड़ी सावधानी भी
सोशल मीडिया पर CM Rekha Gupta के इस बयान को खूब share किया जा रहा है। एक Facebook group ‘Delhi Parents Forum’ में एक माँ ने लिखा — “सुनने में अच्छा लगता है। बस अगली बार जब स्कूल list थमाए, तो सरकार भी साथ खड़ी दिखे।”
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यह एक जायज़ माँग है। दिल्ली के अभिभावकों ने वादे सुने हैं, circular देखे हैं। अब वे नतीजा देखना चाहते हैं।
नया session शुरू होने में ज़्यादा वक्त नहीं है। अगर दिल्ली सरकार इस बार सच में कुछ ठोस कर पाई, तो शायद अगले अप्रैल में वह जाना-पहचाना बोझ थोड़ा हल्का हो जाए।
