कोलकाता की सड़कों पर शाम को जब चाय की दुकानों पर रुझान आने लगे, तो माहौल कुछ अलग ही था। BJP के कार्यकर्ता जश्न में थे। TMC के नेता चुप्पी साधे हुए। और आम बंगाली? वो बस अपने मोबाइल की स्क्रीन को घूरे जा रहा था।
पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ी दिख रही है, जहाँ से इतिहास बदलता है।
रुझान क्या कह रहे हैं?
ताज़ा रुझानों में भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल की कई सीटों पर मजबूत बढ़त बना ली है। जो सीटें अब तक Trinamool Congress का गढ़ मानी जाती थीं, वहाँ भी BJP के उम्मीदवार आगे चल रहे हैं। उत्तर बंगाल, जंगलमहल और मिदनापुर जैसे इलाकों में BJP का प्रदर्शन खासतौर पर चौंकाने वाला है।
यह वो इलाके हैं जहाँ ममता बनर्जी की पकड़ हमेशा से मजबूत रही है।
ममता के लिए खतरे की घंटी
साल 2021 में भी BJP ने पूरी ताकत लगाई थी। प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने रैलियों पर रैलियाँ कीं। लेकिन ममता बनर्जी ने ‘खेला होबे’ के नारे के साथ 213 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया था।
इस बार ज़मीन कुछ और बोल रही है।
TMC के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न बताने की शर्त पर कहा — “हम इन रुझानों को हल्के में नहीं ले रहे। संदेशखाली, RG Kar घटना और महंगाई — इन तीनों ने मिलकर जनता के मन में सवाल खड़े किए हैं।”
संदेशखाली का जिक्र यूँ ही नहीं आया। इस साल की शुरुआत में वहाँ हुई घटनाओं ने पूरे देश का ध्यान खींचा था और TMC को बड़ी किरकिरी झेलनी पड़ी थी।
BJP का दांव कहाँ काम किया?
BJP ने इस बार रणनीति बदली। सिर्फ हिंदुत्व नहीं, बल्कि ‘anti-incumbency’ को हथियार बनाया। केंद्र सरकार की योजनाओं — PM Awas Yojana, Ujjwala, और Kisan Samman Nidhi — को लेकर यह नैरेटिव बनाया कि राज्य सरकार ने बंगाल के लोगों को इनसे वंचित रखा।
ग्रामीण बंगाल में इस बात ने असर किया।
इसके अलावा, RG Kar Medical College rape-murder case ने कोलकाता के शिक्षित मध्यवर्ग को TMC से दूर किया। डॉक्टर, नर्सें, students — सब सड़कों पर उतरे थे। वो गुस्सा कहीं न कहीं ballot box में भी उतरा।
ममता अभी भी मैदान में हैं
लेकिन रुझान, रुझान होते हैं — नतीजे नहीं।
ममता बनर्जी का राजनीतिक करियर देखें तो वो कई बार उस मोड़ पर आई हैं जहाँ विरोधियों ने उन्हें खत्म मान लिया। 2021 में नंदीग्राम से हारने के बावजूद उनकी पार्टी ने भारी बहुमत पाया।
“दीदी को कम मत आँकिए” — यह बात बंगाल की राजनीति में एक अनकहा सच बन चुकी है।
TMC अभी भी कई शहरी सीटों और दक्षिण बंगाल में मजबूत है। अल्पसंख्यक वोट बैंक, जो राज्य में निर्णायक भूमिका निभाता है, अभी भी बड़े पैमाने पर TMC के साथ दिखता है।
बंगाल की जनता किसके साथ?
कोलकाता के एक आम दुकानदार रमेश दास का कहना था — “सरकार बदलनी चाहिए या नहीं, यह तो आप तय करो। लेकिन बिजली का बिल, राशन में कटौती और रोज़गार की कमी — यह सब तो हम देख रहे हैं।”
यही आम आदमी का सवाल है। और इसी सवाल का जवाब तय करेगा कि बंगाल का अगला अध्याय किसके हाथ में लिखा जाएगा।
फिलहाल रुझान BJP के पक्ष में हैं। लेकिन बंगाल की राजनीति ने पहले भी surprises दिए हैं। जो हवा आज चल रही है, वो कल भी रहे — ज़रूरी नहीं।
नज़र बनी रहेगी हर सीट पर, हर वोट पर।
