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ISRO EOS-05 Satellite Launch: ISRO ने रचा इतिहास, GSLV-F17 के साथ लॉन्च हुआ 'बाज' सैटेलाइट EOS-05, जानिए क्यों है खास

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संपादक एवं वरिष्ठ पत्रकार • शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 | 10:49 AM

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ISRO EOS-05 Satellite Launch: ISRO ने रचा इतिहास, GSLV-F17 के साथ लॉन्च हुआ 'बाज' सैटेलाइट EOS-05, जानिए क्यों है खास
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ISRO EOS-05 Satellite Launch के साथ भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने एक बार फिर विश्व पटल पर भारत की तकनीकी श्रेष्ठता का लोहा मनवाया है। शुक्रवार तड़के 2:55 बजे (भारतीय मानकानुसार) सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा से GSLV-F17 रॉकेट के माध्यम से देश के सबसे अत्याधुनिक अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट EOS-05 (जिसे GISAT-1A के नाम से भी जाना जाता है) का सफल प्रक्षेपण किया गया। इस सैटेलाइट को 'अंतरिक्ष का बाज' कहा जा रहा है, क्योंकि यह भारत और उसके पड़ोसी क्षेत्रों पर लगातार और लगभग रियल-टाइम नज़र रखने की अभूतपूर्व क्षमता रखता है।

अंतरिक्ष में भारत की नई उड़ान: मिशन से जुड़े मुख्य तथ्य

इस सफल प्रक्षेपण के बाद रॉकेट ने नियत समय पर EOS-05 उपग्रह को उसकी निर्धारित सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (Sub-GTO) में पूरी सटीकता के साथ स्थापित कर दिया। इस ऐतिहासिक अवसर पर इसरो प्रमुख डॉ. वी. नारायणन ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि GSLV-F17 वाहन ने एडवांस्ड अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट EOS-05 को बेहद सटीक तरीके से उसकी कक्षा में पहुंचाया है। यह भारत के लिए एक महान उपलब्धि है, ठीक उसी तरह जैसे वैश्विक मंच पर महिला वर्ल्ड कप 2025 में भारत की बेटियों ने इतिहास रचा था और देश का सिर गर्व से ऊंचा किया था।

मिशन निदेशक थॉमस कुरियन ने प्रक्षेपण के उपरांत संवाददाताओं को संबोधित करते हुए कहा, "यह हम सभी के लिए बेहद गर्व का क्षण है। जीएसएलवी (GSLV) ने अपना 19वां मिशन सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। EOS-05 लगभग रियल-टाइम इमेजिंग करने में सक्षम सैटेलाइट है। यह GSLV द्वारा सब-जीटीओ ऑर्बिट में भेजा गया अब तक का सबसे भारी उपग्रह है। भले ही लॉन्चिंग में कुछ मिनट का समय लगता है, लेकिन इसके पीछे वैज्ञानिकों की कई महीनों और वर्षों की अनवरत कड़ी मेहनत छिपी होती है।"

EOS-05 (GISAT-1A) की 5 प्रमुख विशेषताएं और रणनीतिक महत्व

यह उपग्रह भारत की अंतरिक्ष रक्षा और पर्यावरण निगरानी क्षमता में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाला माना जा रहा है। इसकी पांच प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

1. जियोस्टेशनरी ऑर्बिट से अनवरत निगरानी

पारंपरिक लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट्स किसी एक विशेष क्षेत्र से केवल निश्चित समय पर ही गुजरते हैं। इसके विपरीत, EOS-05 पृथ्वी से लगभग 36,000 किलोमीटर ऊपर जियोस्टेशनरी कक्षा में तैनात रहेगा। यह भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर एक स्थान पर स्थिर रहकर चौबीसों घंटे और लगभग रियल-टाइम इमेजिंग सेवाएं प्रदान करेगा।

2. आपदा प्रबंधन और त्वरित चेतावनी प्रणाली

यह सैटेलाइट प्रत्येक 30 मिनट में संपूर्ण भारतीय भू-भाग की उच्च-गुणवत्ता वाली तस्वीरें लेने में सक्षम है। किसी प्राकृतिक आपदा के समय यह प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की तस्वीरें हर 5 मिनट में भेज सकता है। इससे चक्रवात, बादल फटने, बाढ़ और जंगलों की आग जैसी घटनाओं की त्वरित ट्रैकिंग संभव हो सकेगी। पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के क्षेत्र में यह कदम उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि यूपी में 40 करोड़ पौधरोपण का लक्ष्य पूरा होना रहा है।

3. रणनीतिक एवं कृषि क्षेत्र में दूरगामी उपयोग

इस उपग्रह की मल्टीस्पेक्ट्रल और हाइपरस्पेक्ट्रल क्षमताएं अद्भुत हैं। यह फसलों के स्वास्थ्य का सही मूल्यांकन करने, जल निकायों के प्रबंधन, वानिकी तथा राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु सीमाओं की रणनीतिक निगरानी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण डेटा प्रदान करेगा। जिस प्रकार जनहित और विकास कार्यों की चर्चा बिहार चुनाव में सीएम योगी का ताबड़तोड़ प्रचार के दौरान प्रमुखता से उठी थी, उसी प्रकार देश की सुरक्षा और कृषि समृद्धि में यह तकनीकी आत्मनिर्भरता एक नया मानदंड स्थापित करेगी।

4. अतीत की असफलताओं से सीखकर मजबूत वापसी

यह सैटेलाइट अगस्त 2021 में क्रायोजेनिक चरण की तकनीकी खराबी के कारण खोए गए EOS-03 (GISAT-1) की जगह लेगा। इस सफल प्रक्षेपण ने इसरो के क्रायोजेनिक अपर स्टेज (CUS) में किए गए व्यापक सुधारों और भारतीय वैज्ञानिकों की दृढ़ता को साबित कर दिया है।

5. GSLV के लिए पेलोड का नया कीर्तिमान

2,367 किलोग्राम वजनी EOS-05 सैटेलाइट GSLV Mk II द्वारा सब-GTO कक्षा में स्थापित किया गया अब तक का सबसे भारी पेलोड बन गया है। 51.7 मीटर ऊंचे इस रॉकेट का कुल लिफ्ट-ऑफ वजन 420.5 टन था, जो इसरो के प्रोपल्शन और स्ट्रक्चरल डिजाइन की मजबूती को दर्शाता है।

सफल प्रक्षेपण पर केंद्रीय नेतृत्व और देश में उत्साह

केन्द्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री जितेंद्र सिंह ने इसरो की पूरी टीम की सराहना की। उन्होंने कहा कि EOS-05 जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से भारत का पहला ऐसा इमेजिंग सैटेलाइट है जो विज़िबल, इन्फ्रारेड, मल्टीस्पेक्ट्रल और हाइपरस्पेक्ट्रल बैंड में एडवांस्ड इमेजिंग की सुविधा देता है। भारत की अंतरिक्ष क्षमताएं लगातार नई ऊंचाइयां छू रही हैं। रक्षा और उच्च तकनीक के क्षेत्र में भारत का यह बढ़ता प्रभाव अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भी दिख रहा है, जैसे पीएम मोदी की इजराइल यात्रा के दौरान भारत के वैश्विक कद को मजबूती मिली थी।

देश की इस वैज्ञानिक उपलब्धि से युवाओं और विद्यार्थियों में भी भारी उत्साह है। जैसे जौनपुर के गांव की बेटी ने CBSE 10वीं में बाजी मारी और अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया, ठीक उसी प्रकार इसरो की यह सफलता देश के लाखों युवा छात्र-छात्राओं को विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में अपना भविष्य बनाने के लिए प्रेरित करेगी।

कठिन चुनौतियों के बाद इसरो का ऐतिहासिक पुनरागमन

गौरतलब है कि एक लंबे और मुश्किल ठहराव के बाद इसरो का यह पहला सफल लॉन्च है। इसरो के लिए 2026 का शुरुआती समय असामान्य रूप से शांत रहा था। इस वर्ष एजेंसी का केवल एक मिशन आयोजित हुआ था, जो 12 जनवरी को PSLV-C62/EOS-N1 मिशन के रूप में था। उस समय रॉकेट के तीसरे चरण में आई खराबी के कारण उपग्रह को कक्षा में स्थापित नहीं किया जा सका था।

लेकिन उस नाकामी से उबरते हुए इसरो ने GSLV-F17 के सफल प्रक्षेपण से साबित कर दिया है कि भारतीय वैज्ञानिक चुनौतियों से हार नहीं मानते। जिस तरह बुनियादी ढांचे और ऐतिहासिक उपलब्धियों को संजोने के लिए दिल्ली मेट्रो म्यूजियम का उद्घाटन किया गया है, उसी तरह इसरो की यह गाथा भी भारत के वैज्ञानिक इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज होगी।

निष्कर्ष: अंतरिक्ष सुरक्षा और आत्मनिर्भर भारत की नई मिसाल

ISRO EOS-05 Satellite Launch केवल एक उपग्रह का प्रक्षेपण नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भर भारत के उस संकल्प की सिद्धि है जो सीमाओं की सुरक्षा से लेकर किसानों के खेतों की रक्षा तक हर मोर्चे पर देश को सशक्त बनाता है। 'बाज' उपग्रह के क्रियाशील होने के बाद भारत प्राकृतिक आपदाओं के पूर्वाभ्यास और सीमाओं की निगरानी में दुनिया के गिने-चुने अग्रणी देशों की कतार में मजबूती से खड़ा हो गया है।

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