जातिगत गणित बनाम ‘योगी ब्रांड’, UP के चुनावी रण से जुड़ा यक्ष प्रश्न
संपादक एवं वरिष्ठ पत्रकार • शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 | 10:31 AM
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस समय योगी ब्रांड बनाम जातिगत गणित यूपी चुनाव का सबसे बड़ा और निर्णायक यक्ष प्रश्न बनकर उभरा है। राज्य में आगामी चुनावों को लेकर राजनीतिक दलों ने अपनी गोटियां बिछानी शुरू कर दी हैं। एक तरफ जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की 'कड़क और निष्पक्ष' छवि यानी 'योगी ब्रांड' है, जो कानून-व्यवस्था, सुशासन और हिंदुत्व के एजेंडे पर टिकी है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दलों का सोशल इंजीनियरिंग और जातिगत गोलबंदी का मजबूत चक्रव्यूह है। इस महामुकाबले ने उत्तर प्रदेश के राजनीतिक विश्लेषकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या विकास और कानून-व्यवस्था का नैरेटिव पारंपरिक जातिगत समीकरणों को ध्वस्त कर पाएगा? हाल के दिनों में उत्तर प्रदेश में भाजपा का जातीय गणित बिगड़ने और सामान्य वर्ग की नाराजगी की खबरों ने सत्ताधारी दल की चिंताएं बढ़ा दी हैं, जिससे यह मुकाबला और भी दिलचस्प हो गया है।
योगी ब्रांड की ताकत: सुशासन और कड़क छवि का सुरक्षा कवच
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छवि एक ऐसे नेता की है जो तुष्टिकरण की राजनीति से परे हटकर 'सबका साथ, सबका विकास' और सख्त कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर चुनाव लड़ता है। उनके समर्थक इसे 'योगी मॉडल' या 'योगी ब्रांड' कहते हैं, जो अपराधियों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति और त्वरित न्याय के लिए जाना जाता है। इस ब्रांड की लोकप्रियता केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी इसकी भारी मांग है।
योगी आदित्यनाथ की इस लोकप्रियता का एक बड़ा आधार उनका जनता से सीधा जुड़ाव भी है। उदाहरण के लिए, गोरखपुर में होने वाले गोरखनाथ मंदिर में मुख्यमंत्री का जनता दर्शन और जनसंवाद इस बात का प्रमाण है कि वे जमीन पर लोगों की समस्याओं को सुनने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। यही कारण है कि विश्लेषक योगी ब्रांड बनाम जातिगत गणित यूपी चुनाव के इस द्वंद्व को बेहद करीब से देख रहे हैं, क्योंकि एक तरफ प्रशासनिक धमक है और दूसरी तरफ जातियों का जटिल ताना-बाना।
विपक्ष का जातिगत चक्रव्यूह और सामाजिक न्याय का नैरेटिव
दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों ने पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों (पीडीए) को एकजुट कर एक नया जातिगत समीकरण तैयार किया है। विपक्ष का मानना है कि उत्तर प्रदेश जैसी घनी आबादी वाले राज्य में बिना जातिगत समीकरणों को साधे चुनाव जीतना असंभव है। विपक्ष लगातार बेरोजगारी, महंगाई और आरक्षण के मुद्दों को उठाकर पिछड़ी और अनुसूचित जातियों को अपने पाले में करने की कोशिश कर रहा है।
इस जातिगत गोलबंदी के कारण भाजपा के भीतर भी रणनीतिक बदलाव की मांग उठने लगी है। हाल ही में वरिष्ठ नेताओं ने संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्वय बनाने की सलाह देते हुए पार्टी को आंतरिक कलह और जातिगत विवादों से बचने की चेतावनी दी थी। इसके अतिरिक्त, नीतिगत स्तर पर भी कुछ फैसलों को लेकर समाज के विभिन्न वर्गों में सुगबुगाहट है, जैसे कि उच्च शिक्षा में जातिगत नीतियों को लेकर सवर्णों के बीच असंतोष देखा गया है, जो पारंपरिक रूप से भाजपा का मजबूत वोटबैंक माने जाते हैं।
क्या उत्तर प्रदेश में फिर लौटेगा 'मंडल बनाम कमंडल' का दौर?
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