शुरुआत में तो यह एक आम-सी तिरंगा यात्रा थी। सोमवार सुबह बजरंगनगर मंडल से निकली, मुट्ठी भर कार्यकर्ताओं के साथ। लेकिन जैसे-जैसे रास्ता आगे बढ़ा, कारवां बढ़ता गया। कोई मोड़ पर आकर जुड़ गया, कोई अगली गली से निकलकर साथ हो लिया। नतीजा यह कि जो यात्रा दो-तीन सौ मीटर में सिमटने वाली थी, वह देखते-देखते चार किलोमीटर लंबी पदयात्रा बन गई।
हाथों में तिरंगा, नारों में जोश — यही तस्वीर पूरे रास्ते बनी रही। और जब यह कारवां सेनापुर ग्रामसभा के शहीद स्मारक तक पहुंचा, तो माहौल एकदम बदल गया। शोर थम गया, सिर झुक गए। वहां मौजूद हर शख्स उन शहीदों को याद कर रहा था जिन्होंने देश के लिए अपनी जान दे दी।
जो यात्रा शुरू में सामान्य तिरंगा यात्रा थी, कार्यकर्ताओं और युवाओं के बढ़ते हुजूम के चलते वह देखते-देखते चार किलोमीटर की पदयात्रा बन गई।
बजरंगनगर से सेनापुर तक, चार किलोमीटर का सफर
आयोजकों से बात करें तो वे भी मानते हैं कि इतनी भीड़ की उम्मीद नहीं थी। एक कार्यकर्ता ने बताया कि शुरुआत में बमुश्किल पचास-साठ लोग थे। फिर टोलियां जुड़ती गईं — कहीं से स्कूली बच्चे, कहीं से बाजार के दुकानदार, कहीं से पड़ोस की महिलाएं। यही सिलसिला यात्रा को सेनापुर तक खींच ले गया।
रास्ते भर एक बात दिलचस्प रही। कई जगह लोग बस देखने के लिए बाहर निकले थे, लेकिन देखते-देखते खुद यात्रा का हिस्सा बन गए। दुकानों के शटर आधे उठे रह गए, घरों की देहरी पर लोग खड़े रहे — और फिर साथ चल पड़े।
शहीद स्मारक पर वह भावुक ठहराव
चार किलोमीटर पैदल चलने के बाद भी थकान किसी के चेहरे पर नहीं थी। शायद इसलिए, क्योंकि हर कोई जानता था कि मंज़िल पर पहुंचकर करना क्या है। शहीद स्मारक पर पहुंचते ही भीड़ खामोश हो गई। कुछ पल के लिए बस सन्नाटा और सिर झुकाए खड़े लोग।
श्रद्धांजलि के बाद भी लोग वहां से हटने में जल्दी में नहीं थे। छोटे-छोटे समूहों में लोग बातें करते रहे — शहीदों के बारे में, उनके गांव-घर के किस्सों के बारे में। आखिरकार कार्यक्रम खत्म हुआ, पर उस स्मारक के पास देर तक लोग जमा रहे।
असली हीरो रहे यात्रा के युवा चेहरे
अगर इस पूरे आयोजन की कोई सबसे बड़ी बात रही, तो वह युवाओं की मौजूदगी थी। बुज़ुर्ग कार्यकर्ताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलते ये युवा किसी और ही ऊर्जा में नज़र आए। आयोजकों का कहना है कि ऐसे कार्यक्रम नई पीढ़ी में देश के प्रति जिम्मेदारी का भाव मजबूत करने का काम करते हैं।
स्थानीय लोगों ने भी इसे सिर्फ एक कार्यक्रम की तरह नहीं लिया। बातचीत में कई लोगों का यही कहना था कि शहीदों को याद रखना कोई एक दिन का काम नहीं, बल्कि यह हर पीढ़ी को सौंपी जाने वाली एक जिम्मेदारी है।

