पंजाब पर 3 लाख करोड़ का कर्ज, फिर भी AAP दोहरा रही अकाली-कांग्रेस की पुरानी गलतियाँ?
पंजाब की धरती पर एक पुरानी कहावत है — ‘जो बीज बोओगे, वही काटोगे।’ लेकिन लगता है चंडीगढ़ की सत्ता में बैठे नेता इस कहावत को भूल चुके हैं। राज्य पर तीन लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज है, खजाना खाली है, किसान परेशान हैं — और बावजूद इसके आम आदमी पार्टी की सरकार वही राह चुन रही है जिस पर चलकर अकाली दल और कांग्रेस ने पंजाब को इस दलदल में धकेला था।
कर्ज का बोझ — कितना भारी है पंजाब पर?
साल 2022 में जब भगवंत मान की अगुवाई में AAP ने पंजाब में ऐतिहासिक जीत हासिल की, तो नारा था — ‘बदलेगा पंजाब।’ लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहानी सुनाते हैं। राज्य का कुल कर्ज 2024-25 तक अनुमानित 3.74 लाख करोड़ रुपये को पार कर चुका है। हर साल ब्याज चुकाने में ही हजारों करोड़ रुपये खर्च हो जाते हैं। यानी पंजाब का आम आदमी जिस टैक्स का पैसा देता है, उसका बड़ा हिस्सा सरकारी विकास पर नहीं, बल्कि पुराने कर्ज की किस्तों पर जाता है।
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यह कर्ज रातोरात नहीं बढ़ा। अकाली दल ने अपने कार्यकाल में मुफ्त बिजली, सब्सिडी और जनलुभावन योजनाओं के नाम पर राज्य की वित्तीय रीढ़ तोड़ी। कांग्रेस ने अमरिंदर सिंह और बाद में चरणजीत सिंह चन्नी के नेतृत्व में यही परंपरा जारी रखी। और अब AAP?
AAP की नीतियाँ — राहत या राज्य पर नया बोझ?
AAP सरकार ने सत्ता में आते ही 300 यूनिट मुफ्त बिजली देने का वादा पूरा किया। इसकी तारीफ भी हुई। लेकिन सवाल यह है कि यह मुफ्त बिजली आ कहाँ से रही है? राज्य के कोष से। जो पहले से खाली था।
इसके अलावा सरकारी नौकरियों की भर्ती में देरी, स्वास्थ्य सेवाओं का ढाँचा जस का तस, और शिक्षा में दिल्ली जैसी क्रांति पंजाब में अब तक नहीं दिखी। वादे बड़े थे — अमल छोटा रहा।
एक वरिष्ठ अर्थशास्त्री ने इस मसले पर कहा था — “जब घर में आग लगी हो, तो आप पहले आग बुझाते हैं, नया फर्नीचर नहीं खरीदते। पंजाब सरकार का काम था कर्ज कम करने की रणनीति बनाना, न कि नई सब्सिडियों का ऐलान करना।”
वही गलती, नया चेहरा
अकाली दल और कांग्रेस की सबसे बड़ी विफलता यह रही कि उन्होंने अल्पकालिक राजनीतिक फायदे के लिए दीर्घकालिक आर्थिक नुकसान उठाया। फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य की राजनीति, सरकारी कर्मचारियों को लुभाने के लिए वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने की जल्दबाजी, और हर चुनाव से पहले राज्य के खजाने को ‘इलेक्शन मोड’ में चलाना — ये सब उसी पुरानी बीमारी के लक्षण हैं।
AAP पर आरोप है कि वह भी चुनावी राज्यों — जैसे दिल्ली और गुजरात — में वोट बटोरने के लिए पंजाब की छवि का इस्तेमाल कर रही है। पंजाब के संसाधन और पंजाब की राजनीति — दोनों अलग-अलग दिशाओं में जाती दिख रही हैं।
किसान, युवा और प्रवासी — पंजाब का असली चेहरा
पंजाब के लुधियाना के एक छोटे व्यापारी रमनदीप सिंह की बात करें। उनकी छोटी फैक्ट्री है, जो बिजली पर निर्भर है। वे कहते हैं, “मुफ्त बिजली घर के लिए ठीक है, लेकिन उद्योग के लिए बिजली के दाम आसमान पर हैं। रोजगार कहाँ से आएगा?”
यही हाल युवाओं का है। पंजाब से हर साल लाखों युवा कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप की तरफ पलायन कर रहे हैं। यह पलायन नया नहीं — लेकिन अब यह रुकने का नाम नहीं ले रहा। सरकार के पास इसका ठोस जवाब नहीं है।
विपक्ष की भूमिका — आलोचना या जवाबदेही?
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अकाली दल और कांग्रेस अब विपक्ष में बैठकर AAP पर निशाना साध रहे हैं। लेकिन जिन्होंने खुद दशकों तक यही किया, उनकी आलोचना की विश्वसनीयता कितनी है — यह पंजाब की जनता भी जानती है। फिर भी सवाल तो उठता ही है कि क्या AAP वाकई ‘बदलाव’ लाई, या सिर्फ चेहरे बदले?
पंजाब को आज जरूरत है एक ऐसी सरकार की जो कठोर आर्थिक फैसले लेने की हिम्मत रखे, लोकलुभावन वादों से परे जाकर राज्य की जड़ें मजबूत करे। वरना यह कर्ज का बोझ अगली पीढ़ी के कंधों पर और भारी होता जाएगा — और पंजाब का वह सुनहरा सवेरा, जिसका वादा हर नेता करता है, हमेशा क्षितिज पर ही टँगा रहेगा।
