उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में सेंगर राजपूत समाज का पारंपरिक मेला हर साल आषाढ़ मास की निश्चित तिथि को आयोजित होता है। इस वर्ष 30 जून 2026 को नागपुर, रसड़ा, पटना और बारेबोझ नामक चार स्थानों पर बने मंदिरों में सेंगर वंश के लोग एकत्रित हुए और श्री नाथ जी को भोग अर्पित किया। इस आयोजन में करीब 5 से 6 लाख श्रद्धालु शामिल हुए।
सेंगर राजपूतों के पूर्वज माने जाने वाले श्री नाथ जी को हिन्दू एकता के प्रतीक के तौर पर पूजा जाता है। हर साल आषाढ़ मास में सेंगर वंश के लोग बलिया के चार प्रमुख स्थानों पर एकत्रित होकर शक्ति प्रदर्शन और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ भोग अर्पित करते हैं।
बलिया के नागपुर, रसड़ा, पटना और बारेबोझ में बने मंदिरों में हर साल आषाढ़ मास में लगभग 5 से 6 लाख सेंगर वंशज एकत्रित होकर श्री नाथ जी को भोग अर्पित करते हैं।
बलिया में सेंगर राजपूत समाज की पुरानी परंपरा क्या है
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, श्री नाथ जी को सेंगर राजपूत वंश का पूर्वज माना जाता है। उन्हें हिन्दू एकता की मिसाल के रूप में देखा जाता है, और यही वजह है कि सेंगर वंश के लोग हर साल इस आयोजन को बड़े स्तर पर मनाते हैं।
परंपरा के अनुसार, यह आयोजन हर वर्ष आषाढ़ मास की एक निश्चित तिथि को होता है। इस वर्ष यह आयोजन 30 जून 2026 को बलिया जिले में हुआ। हालांकि सोर्स सामग्री में इस तिथि के निर्धारण से जुड़े पंचांगीय आधार का विस्तृत उल्लेख नहीं है।
बलिया के चार स्थानों पर बने हैं श्री नाथ जी के मंदिर
सेंगर वंश से जुड़े श्रद्धालुओं के लिए बलिया जिले में चार प्रमुख स्थानों पर मंदिर बनाए गए हैं — नागपुर, रसड़ा, पटना और बारेबोझ। हर साल इन्हीं चार स्थानों पर समाज के लोग एकत्रित होकर पूजा-अर्चना करते हैं।
| स्थान | विशेषता |
|---|---|
| नागपुर | श्री नाथ जी मंदिर, सामूहिक पूजा स्थल |
| रसड़ा | श्री नाथ जी मंदिर, सामूहिक पूजा स्थल |
| पटना | श्री नाथ जी मंदिर, सामूहिक पूजा स्थल |
| बारेबोझ | श्री नाथ जी मंदिर, सामूहिक पूजा स्थल |

आटे और शुगर से बने रोट का भोग, लाठियों से शक्ति प्रदर्शन
इस आयोजन की एक खास परंपरा यह है कि श्री नाथ जी को प्रसाद के रूप में आटा और शुगर के मिश्रण से बना रोट चढ़ाया जाता है। इसके साथ ही समाज के लोग पारंपरिक लाठियों के माध्यम से शक्ति प्रदर्शन करते हैं, जो इस मेले की पहचान बन चुका है।
कागजों पर तस्वीर भले ही एक धार्मिक आयोजन की दिखती हो, लेकिन यह मेला सेंगर समाज के लिए सामाजिक एकजुटता और पहचान का प्रतीक भी माना जाता है। हर वर्ष इस मौके पर समाज के लोग दूर-दराज से अपने मूल स्थान लौटते हैं।
सोर्स सामग्री में मेले की भीड़ प्रबंधन, प्रशासनिक व्यवस्था या सुरक्षा इंतजामों से जुड़ी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। संबंधित प्रशासन या आयोजन समिति की प्रतिक्रिया स्रोत सामग्री में उपलब्ध नहीं है।
बलिया में सेंगर राजपूत मेले में जुटे 5-6 लाख श्रद्धालु
आयोजन को लेकर सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि बलिया के इन चार स्थानों पर हर साल लगभग 5 से 6 लाख लोग एकत्रित होते हैं। इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का जुटना इस आयोजन को क्षेत्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण सामाजिक-धार्मिक घटना बनाता है।
बलिया जिले के सेंगर राजपूत समाज के लिए यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक एकता और सामूहिक पहचान को मजबूत करने का भी एक माध्यम है। हर वर्ष आषाढ़ मास में होने वाला यह मेला अब क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुका है।
लेखक परिचय
लेखक: Nakul Devarshi
विशेषज्ञता: राजनीति, जनसरोकार, करंट अफेयर्स
संपादकीय नोट: यह लेख उपलब्ध स्रोतों, सार्वजनिक जानकारी और आधिकारिक बयानों के आधार पर तैयार किया गया है।
