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पंजाब चुनाव 2027: AAP का भरोसा मान पर, अकाली का सुखबीर पर — कांग्रेस में राहुल ने कसी लगाम

पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच हर प्रमुख राजनीतिक दल अपना चेहरा तय कर रहा है। AAP मुख्यमंत्री भगवंत मान पर भरोसा जता रही है, जबकि अकाली दल सुखबीर सिंह बादल के नेतृत्व में वापसी की कोशिश में है। कांग्रेस में राहुल गांधी ने अंदरूनी कलह पर लगाम कसी है लेकिन प्रदेश में कोई मजबूत चेहरा नहीं उभरा। BJP अभी भी अपनी ज़मीन तलाश रही है। पंजाब का मतदाता इन सभी पार्टियों को उनके कामकाज और वादों के आधार पर परखेगा।

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केंद्रीय संपादकीय डेस्क • शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026 | 12:18 PM

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पंजाब चुनाव 2027: AAP का भरोसा मान पर, अकाली का सुखबीर पर — कांग्रेस में राहुल ने कसी लगाम
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पंजाब की चुनावी पिच पर कप्तानों की जंग

पाँच दरियाओं की धरती पर सियासत का मौसम एक बार फिर करवट ले रहा है। पंजाब में अगले विधानसभा चुनाव की सरगर्मियाँ अभी से शुरू हो गई हैं और हर पार्टी अपना 'कप्तान' तय करने में जुटी है। सवाल सीधा है — मैदान में उतरेगा कौन? जीत का झंडा थामेगा कौन? और सबसे बड़ा सवाल — जनता का भरोसा जीतेगा कौन?

AAP का दाँव: भगवंत मान ही हैं चेहरा

आम आदमी पार्टी के लिए यह सवाल सबसे आसान है। मुख्यमंत्री भगवंत मान ही पार्टी का चेहरा हैं, उनका कप्तान हैं और उनकी ढाल भी। 2022 में जब AAP ने 92 सीटें जीतकर पंजाब की सत्ता पर कब्जा किया था, तब मान की हँसती-बोलती शख्सियत ने जनता का दिल जीता था। एक आम घर से निकला कॉमेडियन से नेता बना शख्स — यही AAP की सबसे बड़ी ताकत है।

लेकिन सत्ता में रहते हुए वादों का बोझ भारी होता है। नशे की समस्या, बेरोज़गारी और किसानों का दर्द — ये मुद्दे मान सरकार के सामने अब भी चुनौती बनकर खड़े हैं। पार्टी के रणनीतिकारों को पता है कि मान की लोकप्रियता ही उनकी सबसे बड़ी पूँजी है, इसलिए उन्हें आगे रखकर चुनावी बिसात बिछाई जाएगी।

अकाली दल: सुखबीर की वापसी का दाँव

शिरोमणि अकाली दल के लिए रास्ता उतना सीधा नहीं है। 2022 के चुनाव में पार्टी को जबरदस्त झटका लगा था — सिर्फ़ तीन सीटें। सुखबीर सिंह बादल पार्टी के अध्यक्ष हैं और कागज़ पर सबसे बड़े चेहरे भी, लेकिन उनके सामने अपनी साख बचाने की बड़ी चुनौती है।

स्वर्ण मंदिर में धार्मिक दंड भुगतने की उनकी घटना ने उन्हें एक अलग ही तरह की सहानुभूति दिलाई, लेकिन सहानुभूति वोट में कैसे बदलती है — यह देखने वाली बात होगी। पार्टी के भीतर भी असंतोष की आवाज़ें उठती रही हैं। बड़े नाम अलग हो चुके हैं, नई पीढ़ी को जोड़ना बाकी है।

"पंजाब की जनता को पता है कि असली सेवा क्या होती है और दिखावे की राजनीति क्या — हम जनता के बीच जाकर जवाब देंगे।" — यह बात सुखबीर बादल के करीबी नेता कहते हैं, लेकिन ज़मीन पर पार्टी को अभी लंबा सफर तय करना है।

कांग्रेस: राहुल की लगाम, प्रदेश में धुंध

कांग्रेस की कहानी सबसे दिलचस्प और सबसे उलझी हुई है। 2022 में अमरिंदर सिंह की विदाई, चरणजीत सिंह चन्नी का छोटा कार्यकाल और नवजोत सिंह सिद्धू की अंदरूनी खींचतान — इन सब ने पार्टी को बुरी तरह तोड़ा था। अब राहुल गांधी ने खुद मोर्चा संभाला है।

सूत्रों की मानें तो राहुल गांधी ने पंजाब कांग्रेस में आंतरिक कलह पर सख्त रुख अपनाया है। कई नेताओं को चुप रहने और पार्टी लाइन पर चलने का साफ संदेश दे दिया गया है। प्रदेश अध्यक्ष और विधायक दल के नेता के बीच समन्वय बनाने की कोशिश जारी है।

लेकिन सवाल वही है — पंजाब में कांग्रेस का चेहरा कौन होगा? कोई एक नाम नहीं जो पूरे प्रदेश को एकजुट कर सके। यही पार्टी की सबसे कमज़ोर कड़ी है।

BJP और BSP: हाशिये पर, लेकिन गेम बिगाड़ने में माहिर

भारतीय जनता पार्टी पंजाब में अभी भी अपनी ज़मीन तलाश रही है। अकाली दल से अलगाव के बाद पार्टी ने अपने दम पर खड़े होने की कोशिश की है, लेकिन किसान आंदोलन की छाया अभी भी है। अमरिंदर सिंह की पार्टी के BJP में विलय के बाद कुछ नए चेहरे जरूर आए, लेकिन वे अभी तक जनता में पैठ नहीं बना पाए।

BSP और अन्य छोटी पार्टियाँ वोटों का समीकरण बिगाड़ने में अहम भूमिका निभा सकती हैं, खासकर दलित बाहुल्य सीटों पर।

असली सवाल: जनता किसे चुनेगी?

पंजाब की राजनीति हमेशा से भावनाओं, धर्म, जाति और किसानी के इर्द-गिर्द घूमती रही है। इस बार भी ये मुद्दे केंद्र में होंगे। AAP के पास सत्ता का रिकॉर्ड है — अच्छा भी, बुरा भी। अकाली के पास एक लंबा इतिहास है और वापसी की तड़प। कांग्रेस के पास दिल्ली से आया नेतृत्व है लेकिन ज़मीन पर बिखराव है।

पंजाब का मतदाता होशियार है। वह देखता है, सुनता है और फिर वोट देता है — अपने हिसाब से, अपनी शर्तों पर। चुनावी पिच सजने में अभी वक्त है, लेकिन कप्तानों की परीक्षा अभी से शुरू हो चुकी है।

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देश की पत्रिका की आधिकारिक संपादकीय एवं रिपोर्टिंग टीम।