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ओपिनियन: फर्जी वीडियो और AI, क्या डीपफेक के भरोसे लड़ी जाएगी भावी राजनीति?

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संपादक एवं वरिष्ठ पत्रकार • गुरुवार, 3 सितंबर 2026 | 05:10 AM

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ओपिनियन: फर्जी वीडियो और AI, क्या डीपफेक के भरोसे लड़ी जाएगी भावी राजनीति?
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भारतीय लोकतंत्र में डीपफेक राजनीति का प्रवेश न केवल चुनावी शुचिता के लिए एक गंभीर संकट बन गया है, बल्कि इसने राजनीतिक विमर्श के स्तर को भी न्यूनतम स्तर पर धकेल दिया है। सोमवार को समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) द्वारा निर्मित एक फर्जी वीडियो प्रस्तुत किए जाने के बाद यह बहस और तेज हो गई है। जब राजनीतिक विरोध व्यक्तिगत आक्षेपों और किसी की गरिमा व धार्मिक आस्था को आहत करने वाले आधुनिक फर्जी साधनों तक पहुंच जाए, तो यह पूरे देश के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बन जाता है। डीपफेक और एआई की मदद से किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति अथवा किसी प्रतिष्ठित धार्मिक पीठ के प्रमुख का विकृत रूप पेश करना केवल एक राजनीतिक विरोधी पर प्रहार भर नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक जीवन में शुचिता, सामान्य शिष्टाचार और नैतिक सीमाओं के पतन को दर्शाता है।

संवैधानिक और पीठ की गरिमा का अनादर

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक चुने हुए जन-प्रतिनिधि और संवैधानिक प्रमुख होने के साथ-साथ लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र 'गोरक्षपीठ' के पीठाधीश्वर भी हैं। भारत की संत परंपरा और श्रद्धालुओं के मन में इस पीठ का विशेष और पूजनीय स्थान है। राजनीतिक विरोध की अपनी सीमाएं होती हैं। नीतियों, कानून-व्यवस्था, विकास और भ्रष्टाचार पर सवाल पूछना विपक्ष का लोकतांत्रिक अधिकार है। किंतु, एआई तकनीक के जरिए किसी पीठाधीश्वर के चरित्र और आस्था से जुड़ी झूठी तस्वीरें गढ़ना सार्वजनिक विमर्श के गिरते स्तर का प्रतीक है। हाल के घटनाक्रमों को देखते हुए राजनीतिक विश्लेषक अक्सर कहते हैं कि Opinion: दलगत भावना से ऊपर सीएम योगी आदित्यनाथ का राजधर्म ही उनकी सबसे बड़ी ताकत रहा है, जिस पर इस तरह के भ्रामक प्रहार बेअसर साबित होते हैं।

निष्कलंक है योगी आदित्यनाथ की छवि

सपा कार्यालय में घटित इस घृणित कार्य का सबसे विरोधाभासी पहलू यह है कि इसमें ऐसे व्यक्ति पर कीचड़ उछालने का प्रयास किया गया, जिसका व्यक्तिगत व सार्वजनिक जीवन एक खुली किताब की तरह और निष्कलंक रहा है। आप उनसे धार्मिक या राजनीतिक मतभेद रख सकते हैं। लेकिन वह चाहें गोरक्षपीठाधीश्वर की भूमिका में सामने आएं अथवा सूबे के मुख्यमंत्री के रूप में, आप योगी आदित्यनाथ पर कदाचार या विलासी जीवन जीने का आरोप नहीं लगा सकते। वह एक कॉरपोरेट सीईओ की कार्यशैली में पूरी कुशलता से प्रदेश का संचालन करते हैं, लेकिन उनकी जीवन शैली एक संत या संन्यासी जैसी ही रहती है।

राम मंदिर का प्रबंधन पूरी तरह स्वतंत्र ट्रस्ट के अधीन है, लेकिन ट्रस्ट का अनुरोध पत्र मिलते ही उन्होंने चढ़ावा प्रकरण पर एसआईटी (SIT) का गठन कर आरोपियों को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। इसके बावजूद अगर कोई योगी आदित्यनाथ को इस प्रकरण से जोड़ने का भोंडा प्रयास करता दिखाई दे तो इसे चुनावी लाभ के लिए पतन की पराकाष्ठा ही कहा जा सकता है। जैसे देश में फर्जी संस्थानों पर लगाम कसने के लिए UGC ने जारी की देश की 32 फर्जी यूनिवर्सिटी की लिस्ट, एडमिशन से पहले चेक करें मान्यता जैसी कड़े कदम उठाए जाते हैं, वैसे ही राजनीति में भी फर्जी नैरेटिव गढ़ने वालों पर सख्त कार्रवाई की जरूरत है।

गोरक्षपीठ की सामाजिक भूमिका और योगी का जीवन

यहाँ यह उल्लेख करना भी आवश्यक हो जाता है कि गोरक्षपीठाधीश्वर के रूप में गुरु गोरखनाथ धाम का संपूर्ण नियंत्रण योगी आदित्यनाथ के पास है। पीठ को नाथ संप्रदाय के देश-दुनिया में बसे अनुयायियों व अन्य भक्तों से नियमित चढ़ावा प्राप्त होता है। साधारण गेरुआ वस्त्र पहनने, साधारण भोजन करने और साधारण बिस्तर पर सोने वाले योगी आदित्यनाथ आखिर क्या करते हैं इस धनराशि का? सपा प्रमुख ने इस बारे में एक क्षण भी सोचा होता तो वह ऐसा आरोप लगाने से पहले सौ बार सोचते। उन्हें मालूम होना चाहिए कि गुरु गोरखनाथ धाम प्रतिदिन हजारों लोगों का पेट भरने के अलावा विगत कई वर्षों से अनेक चैरिटेबल स्कूल-कॉलेज, विश्वविद्यालय, चिकित्सालयों का संचालन और समाज के वंचित तबकों के उत्थान के लिए लगातार काम कर रहा है। अनगिनत लोगों की रोजी-रोटी गुरु गोरखनाथ मंदिर से जुड़ी है। योगी आदित्यनाथ के साथ आपकी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता हो सकती है, लेकिन उनकी जीवन-शैली व ईमानदारी पर सवाल उठाना मानसिक दिवालिएपन के सिवा कुछ नहीं कहा जा सकता।

जनहित के कड़े फैसले और विपक्ष की हताशा

योगी आदित्यनाथ जनहित से जुड़े मुद्दों पर कभी समझौता करते नहीं दिखाई देते, चाहें भले ही उन्हें इसकी कोई बड़ी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़े। उनके कई कड़े फैसले आज देश के लिए नजीर बन चुके हैं, जैसे कि CM योगी का सख्त ऐलान: 'सड़क पर नमाज नहीं होगी' — UP में क्या बदलने वाला है?। बाजार का नियम कहता है कि उत्पाद बनाने वाला उसे बेचने के लिए कोई कसर न छोड़े। लेकिन, जिस मुख्यमंत्री के राज्य में देश के 55 फीसदी मोबाइल फोन का निर्माण हो रहा हो, वह अपने तमाम संवादों में बच्चों, विद्यार्थियों, युवाओं के साथ-साथ अभिभावकों से स्मार्टफोन से दूरी बनाने की अपील करता है। वह राजस्व की चिंता किए बगैर अपनी सभाओं में युवा पीढ़ी को नशे के दुष्प्रभावों से अवगत कराता है। वह लिकर व ड्रग माफिया की कमर तोड़ता है। ऐसे योगी को व्यसन के साथ जोड़कर दिखाना साबित करता है कि लगातार दो हार के बाद अखिलेश यादव राजनीतिक लड़ाई लड़ने की इच्छाशक्ति खो बैठे हैं।

तकनीक का दुरुपयोग और डीपफेक का खतरा

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का मुख्य उद्देश्य समाज को सशक्त बनाना, शासन-प्रशासन में पारदर्शिता लाना और दैनिक जीवन को सुगम बनाना है। लेकिन जब राजनीतिक दल इस तकनीक का उपयोग अपने विरोधियों का चरित्र-हनन करने या भ्रामक नैरेटिव बनाने के लिए करने लगते हैं, तो यह सीधे तौर पर समाज और लोकतंत्र के लिए खतरा बन जाता है। यह डीपफेक राजनीति दर्शाती है कि आने वाले समय में चुनावी स्पर्धा और राजनीतिक जंग में डीपफेक तथा फेक मीडिया का दुरुपयोग किस कदर बढ़ सकता है। अगर ज़िम्मेदार नेता स्वयं इस तरह की सामग्री को अपनी आधिकारिक वार्ताओं में बढ़ाना शुरू करेंगे, तो आम जनता में तकनीक के प्रति अविश्वास और समाज में वैमनस्य ही बढ़ेगा। यह ठीक उसी तरह का भ्रम फैलाता है जैसे वैश्विक स्तर पर Petrol-Diesel Rate: ट्रंप की धमकी से क्रूड ऑयल में उबाल, जानें आज पेट्रोल-डीजल की कीमतें और आगे क्या होगा असर जैसी अनिश्चितताएं बाजार में पैदा करती हैं।

'शुचिता' और 'शिष्टाचार' की आवश्यकता

भारतीय राजनीति का एक स्वर्णिम इतिहास रहा है, जहां वैचारिक मतभेदों के बावजूद नेताओं के बीच व्यक्तिगत सम्मान और शिष्टाचार बना रहता था। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को कभी भी व्यक्तिगत कटुता या धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का साधन नहीं बनाया जाता था। जब शीर्ष स्तर के नेता राजनीतिक लाभ के लिए मर्यादाओं को लांघते हैं, तो इसका संदेश कार्यकर्ताओं और जनसामान्य तक नकारात्मक रूप से जाता है। राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज के लिए एक आचरण प्रस्तुत करने की व्यवस्था भी है।

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