लखनऊ की सियासी फिजा में रविवार को कुछ अलग ही गर्माहट थी।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत तीन दिन के दौरे पर जब लखनऊ उतरे, तो कागज़ पर वजह बस इतनी थी — संघ के पूर्वी क्षेत्र का एक प्रशिक्षण वर्ग। लेकिन जानकार मानते हैं कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह दौरा महज़ एक प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं है।
दिल्ली की नज़र यूपी पर, और यूपी की नज़र 2027 पर
उत्तर प्रदेश। देश का सबसे बड़ा राज्य। 80 लोकसभा सीटें। 403 विधानसभा क्षेत्र। यहाँ जो होता है, वो पूरे देश की राजनीति की दिशा तय करता है — यह बात संघ से बेहतर कोई नहीं जानता।
सूत्रों की मानें तो भागवत इस दौरान संघ के शताब्दी वर्ष से जुड़े अभियानों की समीक्षा करेंगे। शाखा विस्तार कहाँ तक हुआ, संगठनात्मक ढाँचा कितना मज़बूत है, कमज़ोर कड़ियाँ कहाँ हैं — इन सब पर बात होगी। लेकिन बातचीत यहीं नहीं रुकेगी।
“यूपी सरकार के कामकाज का आकलन भी इस दौरे का एक अनकहा एजेंडा है” — एक वरिष्ठ संघ पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया।
योगी और भागवत की मुलाकात — हवा में सवाल
सबसे ज़्यादा जिस बात पर राजनीतिक हलकों की नज़र टिकी है, वो है मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और मोहन भागवत के बीच संभावित मुलाकात।
अभी तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन संघ और सरकार के बीच इस स्तर का संवाद जब भी होता है, उसके असर महीनों बाद दिखते हैं — कभी नीति में, कभी संगठन में, कभी चेहरों में।
भाजपा के कई वरिष्ठ पदाधिकारी भी इस दौरान लखनऊ में जुटेंगे। यानी एक तरफ संगठन की बैठक, दूसरी तरफ सरकार का हिसाब-किताब — और बीच में 2027 की वो तारीख, जो अभी दो साल दूर है लेकिन तैयारियाँ अभी से शुरू हो चुकी हैं।
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शताब्दी वर्ष — संघ के लिए यह समय खास क्यों है
2025 में RSS अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है। 1925 में नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने जो बीज बोया था, वो आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है। ऐसे में यह प्रशिक्षण वर्ग केवल routine नहीं है — यह उस शताब्दी की ऊर्जा को ज़मीनी स्तर तक पहुँचाने की कोशिश है।
स्वयंसेवकों को यह बताया जा रहा है कि आने वाले महीने संगठन के लिए कितने निर्णायक हैं। नई शाखाएँ, नए कार्यकर्ता, नई ज़िम्मेदारियाँ — यह सब उसी बड़े चित्र का हिस्सा है।
लखनऊ से जो संदेश जाएगा
तीन दिन। कई बैठकें। अनगिनत चेहरे।
मोहन भागवत का यह दौरा खत्म होगा तो शायद कोई बड़ा बयान नहीं आएगा, कोई press conference नहीं होगी। संघ का तरीका ही यही है — शांत, सुनियोजित, और दूरगामी।
लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि इन तीन दिनों में जो बातें होंगी, उनकी गूँज यूपी की राजनीति में 2027 तक सुनाई देती रहेगी। क्योंकि चुनाव सिर्फ voting machine से नहीं जीते जाते — उनकी नींव महीनों पहले, ऐसे ही प्रशिक्षण वर्गों और अनौपचारिक बैठकों में रखी जाती है।
लखनऊ इस वक्त सिर्फ एक शहर नहीं है — यह उस बड़े खेल का अगला पड़ाव है, जिसकी असली परीक्षा अभी दो साल बाद होगी।
