सुप्रीम कोर्ट बच्चों का इंटरनेट अधिकार: इंटरनेट से दूर रखना बेतुका, SC ने दिए कड़े निर्देश
संपादक एवं वरिष्ठ पत्रकार • शनिवार, 17 अक्टूबर 2026 | 02:27 PM
नई दिल्ली: देश में डिजिटल क्रांति के इस दौर में सुप्रीम कोर्ट बच्चों का इंटरनेट अधिकार सुरक्षित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि इंटरनेट का उपयोग करना हर व्यक्ति और किसी भी उम्र के बच्चे का मौलिक अधिकार है। शीर्ष अदालत ने कहा कि बच्चों को इंटरनेट की दुनिया से पूरी तरह अलग रखना न केवल बेतुका है, बल्कि यह उनकी स्वतंत्रता और सुरक्षा के बीच संतुलन को बिगाड़ता है। सर्वोच्च न्यायालय ने बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) को इंटरनेट से स्थायी रूप से हटाने और बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार तथा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
सुरक्षा और स्वतंत्रता का संतुलन: पूर्ण प्रतिबंध समाधान नहीं
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए टिप्पणी की कि बच्चों की सुरक्षा और उनकी व्यक्तिगत आजादी एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। कोर्ट के अनुसार, केवल गलत या आपत्तिजनक सामग्री की उपस्थिति के कारण इंटरनेट पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना कोई तार्किक समाधान नहीं हो सकता। इस तरह की कठोर पाबंदियों से बच्चे अधिक असुरक्षित तथा अनियमित प्लेटफॉर्म्स की ओर रुख कर सकते हैं, जिससे उनका जोखिम और बढ़ जाता है। इसके अलावा, ऑनलाइन उत्पीड़न का शिकार होने वाले बच्चे डर के कारण शिकायत दर्ज कराने में हिचकिचा सकते हैं।
देश में बढ़ते डिजिटल नेटवर्क के बीच बच्चों की पढ़ाई और उनके अधिकारों की सुरक्षा के लिए यह आवश्यक है कि उन्हें एक सुरक्षित और पारदर्शी ऑनलाइन वातावरण मिले। अदालत ने रेखांकित किया कि तकनीक से दूर रखने के बजाय तकनीक के सुरक्षित इस्तेमाल के प्रति जागरूकता फैलाना ही सही कदम है।
राष्ट्रीय डेटाबेस और डिजिटल पहचान (हैश) का निर्माण
आपत्तिजनक सामग्री के प्रसार को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक समर्पित राष्ट्रीय डेटाबेस स्थापित करने का निर्देश दिया है। इस डेटाबेस में वास्तविक तस्वीरें या वीडियो नहीं रखे जाएंगे, बल्कि प्रमाणित सामग्री की डिजिटल पहचान (हैश कोड) और संबंधित वेबसाइटों के लिंक दर्ज किए जाएंगे। यह व्यवस्था मौजूदा सहयोग पोर्टल के माध्यम से या एक अलग प्रणाली बनाकर लागू की जा सकती है।
तीन स्वतंत्र विशेषज्ञों की समिति करेगी जांच
किसी भी सामग्री को डेटाबेस में शामिल करने से पहले उसकी गहन समीक्षा की जाएगी। कम से कम तीन प्रशिक्षित विशेषज्ञ स्वतंत्र रूप से यह सत्यापित करेंगे कि सामग्री बाल यौन शोषण से जुड़ी है अथवा नहीं। शुरुआती चरण में डिजिटल विश्लेषण सॉफ्टवेयर की सहायता ली जा सकेगी। इसके साथ ही, डेटाबेस तक पहुंच की पूरी लॉग एंट्री रखी जाएगी और नियमित रूप से स्वतंत्र ऑडिट कराया जाएगा, ताकि किसी भी गलत प्रविष्टि को शिकायत मिलने पर तुरंत हटाया जा सके।
जब किसी एक प्लेटफॉर्म से आपत्तिजनक कंटेंट हटाया जाएगा, तो डेटाबेस से मिलान करके वही कंटेंट दोबारा किसी अन्य प्लेटफॉर्म पर अपलोड होने पर तुरंत पहचान लिया जाएगा।
सोशल मीडिया कंपनियों के लिए 2 घंटे की समयसीमा
सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया कंपनियों के लिए पुलिस और जांच एजेंसियों को रिपोर्ट करने की सख्त समयसीमा तय की है। इन कंपनियों को विशेष किशोर पुलिस इकाई (SJPU), स्थानीय पुलिस या राष्ट्रीय साइबर क्राइम पोर्टल को निम्नलिखित परिस्थितियों में रिपोर्ट सौंपनी होगी:
- कंपनी द्वारा स्वयं खोजे गए कंटेंट पर: अज्ञात स्रोत वाले आपत्तिजनक कंटेंट को हटाने के दो घंटे के भीतर पुलिस को सूचित करना अनिवार्य होगा।
- शिकायत के आधार पर हटाने पर: उपयोगकर्ता की शिकायत का निपटारा होते ही तुरंत रिपोर्ट दी जाएगी, जिसमें दो घंटे से अधिक का विलंब नहीं होना चाहिए।
- डेटाबेस मिलान पर: राष्ट्रीय डेटाबेस से मैच होने पर हटाए गए कंटेंट की समेकित रिपोर्ट साप्ताहिक आधार पर संबंधित अधिकारियों को भेजी जाएगी।
अदालत ने कहा कि जिस प्रकार साइबर अपराधों के मामलों में साइबर अपराध और अदालती फैसलों के जरिए जवाबदेही तय की जाती है, ठीक उसी तरह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भी जिम्मेदार बनना होगा।
24 घंटे में रेफरेंस नंबर और शिकायत निवारण
अदालत ने कंपनियों को अपनी वेबसाइट और मोबाइल ऐप पर शिकायत अधिकारी का विवरण स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करने का निर्देश दिया है। बच्चों के शोषण से जुड़े मामलों के लिए एक अलग शिकायत विकल्प उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा। शिकायत दर्ज होने के 24 घंटे के भीतर शिकायतकर्ता को पावती और एक अद्वितीय रेफरेंस नंबर जारी किया जाएगा। प्रशिक्षित अधिकारी शिकायत की समीक्षा करेंगे और कार्रवाई या फैसले का स्पष्ट कारण शिकायतकर्ता को बताएंगे।
डिजिटल जवाबदेही और पुलिस तंत्र के सुदृढ़ीकरण के संदर्भ में, जैसे दिल्ली पुलिस और सुरक्षा ढांचे में सुधार की मांग उठती रही है, वैसे ही अब बाल सुरक्षा के लिए विशेष पुलिस इकाइयों की कार्यकुशलता बढ़ानी होगी।
उल्लंघन पर आर्थिक जुर्माना और आय जब्ती पर विचार
कोर्ट ने केंद्र सरकार को सूचना प्रौद्योगिकी कानून एवं नियमों में आवश्यक संशोधन करने का सुझाव दिया है, ताकि नियम तोड़ने वाली कंपनियों पर भारी आर्थिक जुर्माना लगाया जा सके। जुर्माना तय करते समय उल्लंघन की गंभीरता, उसकी अवधि, बारंबारता तथा कंपनी के कुल टर्नओवर को ध्यान में रखा जाएगा। इसके अतिरिक्त, ऐसी गैर-कानूनी सामग्री के जरिए कमाई गई धनराशि को जब्त करने और सशुल्क (पेड/सब्सक्रिप्शन) वेबसाइटों की कड़ी निगरानी करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
न्यायिक प्रक्रिया में निष्पक्षता और समयबद्धता पर बल देते हुए, जैसे हाल के समय में हाईकोर्ट में दायर याचिकाओं या पुलिस रिपोर्ट मांगने के अदालती आदेशों के माध्यम से प्रशासनिक तंत्र को उत्तरदायी बनाया गया है, उसी प्रकार आईटी नियमों में ये बदलाव डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को जवाबदेह बनाएंगे।
स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल होगी ऑनलाइन सुरक्षा
न्यायालय ने कहा कि बच्चों को ऑनलाइन खतरों की पहचान करने और उनके खिलाफ आवाज उठाने के लिए सशक्त बनाना आवश्यक है। इसके लिए NCERT और सभी राज्यों की SCERT को बाल मनोवैज्ञानिकों, शिक्षकों तथा विशेषज्ञों की मदद से उम्र के अनुकूल पाठ्य सामग्री तैयार करने का निर्देश दिया गया है।
स्कूली शिक्षा में निम्नलिखित मुख्य विषयों को शामिल किया जाएगा:
- सहमति, निजता और स्वस्थ डिजिटल संबंध।
- सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श तथा निजी जानकारी की सुरक्षा।
- ऑनलाइन उत्पीड़न की पहचान और बचाव के तरीके।
- शिकायत दर्ज कराने की सही प्रक्रिया और हेल्पलाइन नंबर।
केंद्र सरकार 10 दिसंबर तक सौंपेगी अनुपालन रिपोर्ट
सर्वोच्च अदालत ने इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) और कानून एवं न्याय मंत्रालय को इन निर्देशों को लागू करने के लिए आवश्यक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने और कानून में बदलाव के कदम उठाने को कहा है। केंद्र सरकार को 10 दिसंबर तक हलफनामा दायर कर यह बताना होगा कि इन निर्देशों के क्रियान्वयन में कितनी प्रगति हुई है। मामले की अगली सुनवाई 10 दिसंबर को निर्धारित की गई है।