वो दौर जब बिहार जलता था
साल 1990। लालू प्रसाद यादव की आंधी में पुरानी कांग्रेसी व्यवस्था धराशायी हो रही थी। एक तरफ मंडल की आग, दूसरी तरफ कमंडल का धुआं। बिहार की सड़कों पर जाति और धर्म का ऐसा खेल शुरू हुआ जिसने पूरे देश की राजनीति को नई दिशा दी। अब तीन दशक बाद, जब नीतीश कुमार की उम्र और उनके उत्तराधिकार का सवाल हर जुबान पर है — तो एक पुराना डर फिर से सिर उठाने लगा है। क्या बिहार फिर उसी मोड़ पर खड़ा है?
नीतीश का जाना सिर्फ एक नेता का जाना नहीं
नीतीश कुमार को अगर बिहार की राजनीति का ‘संतुलन बिंदु’ कहें तो गलत नहीं होगा। उन्होंने 2005 में सत्ता संभाली तो एक ऐसे राज्य की कमान थी जहां जंगलराज की चर्चा राष्ट्रीय मीडिया में रोज होती थी। उन्होंने जाति के समीकरण को प्रशासन और विकास के साथ मिलाकर एक अलग राजनीतिक फॉर्मूला तैयार किया। अति पिछड़ा वर्ग, महिला वोटर और सुशासन — यही उनके तीन स्तंभ रहे।
लेकिन आज जब उनकी उम्र 73 पार कर चुकी है और स्वास्थ्य को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हैं, तो बिहार का राजनीतिक गलियारा उस सवाल से बच नहीं पा रहा — नीतीश के बाद कौन? और उससे भी बड़ा सवाल — नीतीश के बाद क्या?
अगड़ा-पिछड़ा की खाई फिर चौड़ी हो रही है
बिहार में भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और कायस्थ यानी सवर्ण जातियां एक तरफ। यादव, कुर्मी, कोइरी और दर्जनों अति पिछड़ी जातियां दूसरी तरफ। बीच में दलित और मुस्लिम — दोनों अपनी-अपनी दिशा तलाशते हुए।
नीतीश ने इस समीकरण को तोड़ा नहीं, बल्कि नया संतुलन बनाया। उन्होंने सवर्णों को भी साथ रखा और पिछड़ों को भी नहीं छोड़ा। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह संतुलन नीतीश की व्यक्तिगत साख पर टिका है, किसी संस्थागत ढांचे पर नहीं।
पटना के एक वरिष्ठ पत्रकार की बात याद आती है जिन्होंने कहा था — “नीतीश ने बिहार को स्थिरता दी, लेकिन वो स्थिरता एक आदमी की है, किसी विचार की नहीं।”
हिंदुत्व बनाम जातीय राजनीति — असली लड़ाई
भाजपा के लिए बिहार हमेशा एक जटिल प्रयोगशाला रही है। 90 के दशक में राम मंदिर आंदोलन ने यहां भी असर दिखाया था, लेकिन मंडल की आंधी ने हिंदुत्व को जातिगत समीकरणों के सामने कमजोर कर दिया। अब जब मोदी-शाह की जोड़ी ने उत्तर प्रदेश में हिंदुत्व का सफल प्रयोग किया है, तो सवाल यह है — क्या बिहार में भी वही फॉर्मूला काम करेगा?
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बिहार और उत्तर प्रदेश में फर्क है। बिहार में जातीय चेतना इतनी गहरी है कि धार्मिक ध्रुवीकरण उसके ऊपर आसानी से नहीं चढ़ पाता। यही वजह है कि भाजपा को यहां हमेशा किसी स्थानीय चेहरे की जरूरत पड़ती है — पहले नीतीश, और अब भी नीतीश।
लेकिन नीतीश के बाद? भाजपा के पास बिहार में कोई ऐसा स्थानीय चेहरा नहीं जो सवर्ण और पिछड़े दोनों को एक साथ साध सके।
तेजस्वी का दांव और लालू की विरासत
दूसरी तरफ तेजस्वी यादव हैं। युवा, आक्रामक और सोशल मीडिया सेवी। लेकिन उनकी राजनीति अभी भी यादव-मुस्लिम गठजोड़ के इर्द-गिर्द घूमती दिखती है। 2020 के चुनाव में उन्होंने बेरोजगारी का मुद्दा उठाकर नया वोटर भी जोड़ा, लेकिन सत्ता की दहलीज तक पहुंचकर भी वो चूक गए।
तेजस्वी अगर नीतीश के बाद बिहार की सत्ता पाते हैं, तो जातीय राजनीति फिर उसी 90 वाले ढर्रे पर लौट सकती है। सवर्ण जातियां एकजुट होंगी, भाजपा उन्हें कैश करने की कोशिश करेगी, और फिर वही पुराना संघर्ष — जो बिहार ने झेला, जिससे बिहार निकला और जिसमें बिहार फिर फंस सकता है।
2025 के बाद का बिहार — एक नई राजनीतिक प्रयोगशाला
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में होने हैं। नीतीश उम्र के इस पड़ाव पर मुख्यमंत्री के रूप में पूरा कार्यकाल पूरा करेंगे या नहीं, यह एक बड़ा सवाल है। NDA गठबंधन की चुनौती यह है कि वो एक ऐसा चेहरा खड़ा करे जो नीतीश की विरासत को आगे ले जा सके — न सिर्फ वोट में, बल्कि शासन में भी।
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जो राज्य कभी जंगलराज का पर्याय था, जिसने विकास की राह पकड़ी, जिसने देश को यह दिखाया कि बदलाव संभव है — वो राज्य अब एक चौराहे पर खड़ा है। रास्ता एक तरफ 90 के दशक की जातीय खाइयों की ओर जाता है, दूसरी तरफ एक नए बिहार की संभावना है।
लेकिन इतिहास गवाह है — बिहार में राजनीतिक वैक्यूम कभी खाली नहीं रहता। और जब वो भरता है, तो अक्सर ऐसे रंगों से भरता है जिनकी किसी ने उम्मीद नहीं की होती।
