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Sunday, 26 Apr 2026

डॉ. ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह: भारतीय कृषि अनुसंधान के शीर्ष वैज्ञानिक का सफर

डॉ. ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह

वाराणसी से लेकर राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो की निदेशक पद तक का प्रेरक सफर

नई दिल्ली, 12 फरवरी 2026 | भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (एनबीपीजीआर) के वर्तमान निदेशक डॉ. ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह देश के सबसे प्रतिष्ठित कृषि वैज्ञानिकों में से एक हैं। गेहूं और जौ अनुसंधान में उनके महत्वपूर्ण योगदान ने उन्हें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है।

प्रारंभिक जीवन और शैक्षणिक पृष्ठभूमि

17 मार्च 1964 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी में जन्मे डॉ. सिंह ने अपनी शुरुआती शिक्षा केंद्रीय हिंदू विद्यालय, वाराणसी से 1979-81 के दौरान प्राप्त की। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से 1984 में बीएससी (ऑनर्स) की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने 1988 में एमएससी (कृषि) की उपाधि प्राप्त की।

डॉ. सिंह ने 1992 में चंद्र शेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की डिग्री प्राप्त कर अपनी शैक्षणिक यात्रा को पूर्ण किया।

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शोध कार्य की शुरुआत

डॉ. सिंह का व्यावसायिक सफर 1993 में राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान केंद्र, इंदौर से वैज्ञानिक के रूप में शुरू हुआ। इसके बाद उन्होंने 1994-96 के दौरान केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला में कार्य किया।

1996 से 2001 के दौरान वे गेहूं अनुसंधान निदेशालय, करनाल में वैज्ञानिक और वरिष्ठ वैज्ञानिक के पद पर रहे। 2001 से 2016 तक उन्होंने भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई), नई दिल्ली में वरिष्ठ वैज्ञानिक और प्रधान वैज्ञानिक के रूप में अपनी सेवाएं दीं।

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गेहूं और जौ अनुसंधान में योगदान

2016 से 2022 तक डॉ. सिंह ने आईसीएआर-भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल के निदेशक के रूप में कार्य किया। इस दौरान उन्होंने गेहूं की नई किस्मों के विकास और अजैविक तनाव प्रबंधन में महत्वपूर्ण शोध कार्य किए।

वर्तमान में वे 2022 से राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, नई दिल्ली के निदेशक के पद पर कार्यरत हैं।

अनुसंधान विशेषज्ञता

डॉ. सिंह की विशेषज्ञता के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल हैं:

  • पादप आनुवंशिक संसाधन प्रबंधन
  • गेहूं सुधार और विकास
  • अजैविक तनाव प्रबंधन
  • शारीरिक फेनोटाइपिंग
  • मार्कर असिस्टेड रिकरेंट सिलेक्शन (MARS)
  • मार्कर असिस्टेड बैकक्रॉस ब्रीडिंग (MABB)

पुरस्कार और सम्मान

डॉ. सिंह को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है:

राष्ट्रीय पुरस्कार:

  • डॉ. रफी अहमद किदवई पुरस्कार (2015)
  • डॉ. नानाजी देशमुख टीम पुरस्कार (2018)
  • बीजीआरआई जीन प्रबंधन पुरस्कार (2018)
  • डॉ. एबी जोशी मेमोरियल पुरस्कार (2020)
  • आउटलुक उत्कृष्ट वैज्ञानिक पुरस्कार (2020)
  • डॉ. बीपी पाल स्वर्ण पदक (2016)

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विशेष सम्मान:

  • कृषि में उत्कृष्ट नेतृत्व के लिए एआईएसए राष्ट्रीय पुरस्कार (2019)
  • कृषि नेतृत्व पुरस्कार, राष्ट्रीय शैक्षिक सशक्तिकरण और विकास फाउंडेशन (2019)
  • महेंद्र समृद्धि पुरस्कार (2016, 2020)
  • डॉ. एनएन सिंह मेमोरियल उत्कृष्ट वैज्ञानिक पुरस्कार (2022)

वैज्ञानिक संगठनों में नेतृत्व

डॉ. सिंह ने कई प्रमुख वैज्ञानिक संगठनों में महत्वपूर्ण नेतृत्व पद संभाले हैं:

  • अध्यक्ष, इंडियन सोसाइटी ऑफ जेनेटिक्स एंड प्लांट ब्रीडिंग (2020-2022)
  • अध्यक्ष, सोसाइटी फॉर एडवांसमेंट ऑफ व्हीट एंड बार्ली (2016-22)

फेलोशिप और सदस्यता

डॉ. सिंह निम्नलिखित प्रतिष्ठित संस्थाओं के फेलो हैं:

  • भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (2015)
  • गेहूं अनुसंधान संवर्धन सोसायटी, करनाल
  • भारतीय आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन सोसायटी, नई दिल्ली
  • कृषि एवं प्रौद्योगिकी में वैज्ञानिक विकास सोसायटी, झांसी

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खाद्य सुरक्षा में योगदान

डॉ. सिंह का शोध कार्य भारत की खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उनके नेतृत्व में विकसित गेहूं की नई किस्में किसानों को बेहतर उत्पादन और जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर रही हैं।

पादप आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण और प्रबंधन में उनका कार्य भविष्य की पीढ़ियों के लिए जैव विविधता को सुरक्षित रखने में सहायक है।

ज्यादा अपडेट के लिए deshkipatrika.com पर बने रहें।

संपर्क सूत्र

कार्यालय पता:
निदेशक, आईसीएआर-राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो
नई दिल्ली 110012
दूरभाष: (011) 25802781, 25843697
मोबाइल: 9868841775, 8708529619
ईमेल: director.nbpgr@icar.gov.in


देशकीपत्रिका | भारतीय कृषि विज्ञान क्षेत्र में डॉ. ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह जैसे समर्पित वैज्ञानिकों की मेहनत देश को आत्मनिर्भर और खाद्य सुरक्षा में सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। उनकी शोध यात्रा युवा वैज्ञानिकों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।