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जंतर मंतर 2.0: जेन जी ने आंदोलन से बनाई दूरी, जानें क्यों फ्लॉप साबित हुआ प्रदर्शन

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संपादक एवं वरिष्ठ पत्रकार • रविवार, 11 अक्टूबर 2026 | 03:15 PM

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जंतर मंतर 2.0: जेन जी ने आंदोलन से बनाई दूरी, जानें क्यों फ्लॉप साबित हुआ प्रदर्शन
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नई दिल्ली (महेंद्र प्रताप सिंह)। राष्ट्रीय राजधानी का ऐतिहासिक प्रदर्शन स्थल जंतर-मंतर एक बार फिर राजनीतिक सरगर्मियों का केंद्र बना, लेकिन इस बार नजारा पूरी तरह बदला हुआ था। मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) द्वारा आयोजित जंतर मंतर 2.0 प्रदर्शन में युवाओं का वह पुराना सैलाब नजर नहीं आया। पिछले आंदोलनों में अग्रिम पंक्ति में रहने वाले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) और दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के आम छात्रों ने इस बार प्रदर्शन से पूरी तरह दूरी बनाए रखी। जहां एक ओर राजनीतिक मंचों से बड़े-बड़े दावे किए जा रहे थे, वहीं धरातल पर जेन-जी (Gen-Z) यानी आज के युवाओं की अनुपस्थिति ने आयोजकों के सभी दावों की हवा निकाल दी।

विश्वविद्यालय प्रशासन की सख्त एडवाइजरी का खौफ

सूत्रों और प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, इस बार छात्रों की अनुपस्थिति का सबसे बड़ा कारण विश्वविद्यालय प्रशासन का सख्त रुख रहा। प्रदर्शन से ठीक पहले जेएनयू और डीयू प्रशासन की ओर से छात्रों के लिए कड़ी हिदायत और आधिकारिक एडवाइजरी जारी की गई थी। छात्रों को साफ चेतावनी दी गई थी कि वे न तो इस प्रदर्शन का हिस्सा बनें और न ही सोशल मीडिया पर इसके समर्थन में कोई पोस्ट साझा करें। अनुशासनात्मक और कानूनी कार्रवाई के इसी डर के कारण अधिकांश छात्रों ने अपने घरों और हॉस्टलों में ही रहना मुनासिब समझा।

इससे पहले भी जब राजनीति गरमाई थी, तब कॉकरोच जनता पार्टी जंतर-मंतर विरोध को लेकर काफी चर्चा हुई थी, लेकिन इस बार छात्रों ने अपने करियर और भविष्य को तरजीह दी। एक वरिष्ठ छात्र प्रतिनिधि ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि शैक्षणिक संस्थानों में प्रशासनिक सख्ती और उपस्थिति नियमों के कड़े होने की वजह से आम छात्र अब बिना किसी स्पष्ट और ठोस मुद्दे के सड़कों पर उतरने से कतरा रहे हैं।

केवल छात्र संगठनों के पदाधिकारी ही आए नजर

जहां पिछले पेपर लीक विवाद के दौरान डीयू के 50 हजार से अधिक छात्रों ने सड़कों पर उतरकर अपनी आवाज बुलंद की थी, वहीं इस बार माहौल पूरी तरह ठंडा रहा। जंतर-मंतर के आसपास केवल वामपंथी छात्र संगठन आइसा (AISA) और कांग्रेस के छात्र विंग एनएसयूआई (NSUI) के कुछ गिने-चुने पदाधिकारी और कार्यकर्ता ही झंडे और बैनर के साथ सक्रिय दिखाई दिए। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी (डीटीयू) और अंबेडकर विश्वविद्यालय जैसे बड़े संस्थानों से भी छात्रों को जुटाने में ये संगठन पूरी तरह नाकाम रहे।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष और आयोजक युवाओं से जुड़ने में पूरी तरह विफल रहे हैं। पूर्व में जब सीजेपी चीफ अभिजीत दीपके का पलटवार सामने आया था, तब ऐसा लगा था कि कैडर में नया जोश भरेगा, लेकिन धरातल पर उसकी कोई झलक देखने को नहीं मिली। इसकी तुलना अगर अन्य जनांदोलनों से करें, जैसे जंतर-मंतर पर यूजीसी विरोध प्रदर्शन में देखी गई भीड़, तो जंतर मंतर 2.0 उस आंकड़े के आसपास भी नहीं पहुंच सका।

दिल्ली पुलिस का चक्रव्यूह: अभूतपूर्व सुरक्षा और नाकेबंदी

छात्रों के न पहुंच पाने के पीछे दिल्ली पुलिस की सख्त घेराबंदी भी एक बड़ी वजह रही। पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा के ऐसे पुख्ता इंतजाम किए थे कि परिंदा भी पर न मार सके। पूरी लुटियंस दिल्ली को छावनी में तब्दील कर दिया गया था। सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए निम्नलिखित कड़े कदम उठाए गए:

  • मेट्रो स्टेशनों की बंदी: प्रदर्शनकारियों की आवाजाही को नियंत्रित करने के लिए दिल्ली मेट्रो के 55 से अधिक प्रमुख स्टेशनों को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया था, जिससे यातायात और आवागमन पूरी तरह प्रभावित हुआ।
  • धारा 163 लागू: जंतर-मंतर और उसके आसपास के संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा कारणों से धारा 163 (पूर्व में धारा 144) लागू कर दी गई थी, जिससे चार से अधिक लोगों के एक जगह एकत्र होने पर पूर्ण पाबंदी थी।
  • शीर्ष नेताओं की धरपकड़: सीजेपी के प्रमुख चेहरों और छात्र नेताओं को प्रदर्शन स्थल पर पहुंचने से पहले ही एहतियातन हिरासत में ले लिया गया था, जिससे आंदोलन पूरी तरह नेतृत्वविहीन हो गया।

हाल के दिनों में दिल्ली की राजनीतिक सरगर्मियों को देखते हुए कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस प्रशासन की पहली प्राथमिकता थी। व्यापक पुलिस बल और अर्धसैनिक बलों की तैनाती ने किसी भी अप्रिय स्थिति को पनपने ही नहीं दिया।

सोशल मीडिया पर भी दिखा बेरुखी का माहौल

दिलचस्प बात यह रही कि जो 'जेन-जी' (Gen-Z) युवा किसी भी डिजिटल अभियान या हैशटैग को मिनटों में ट्रेंड करा देते हैं, वे भी इस बार पूरी तरह खामोश दिखे। इंटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर सीजेपी के समर्थन में पोस्ट और ट्वीट्स की संख्या बेहद सीमित रही। यह ट्रेंड साफ दर्शाता है कि आज का युवा केवल राजनीतिक एजेंडे के लिए सड़कों पर उतरने को तैयार नहीं है। एक तरफ जहां सरकार उद्योग मित्र पोर्टल जैसी डिजिटल पहलों के जरिए युवाओं और कारोबारियों को राहत देने का दावा कर रही है, वहीं युवाओं का रुझान भी रोजगार, कौशल विकास और करियर से जुड़े मुद्दों की ओर अधिक देखा जा रहा है।

निष्कर्ष एवं भविष्य की राह

कुल मिलाकर, भारी पुलिस बल की तैनाती, विश्वविद्यालय प्रशासनों की सख्त हिदायतों और युवाओं की उदासीनता के चलते 'जंतर मंतर 2.0' का यह प्रदर्शन अपनी अपेक्षाओं के अनुरूप भीड़ जुटाने में पूरी तरह असफल साबित हुआ है। इस घटनाक्रम ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि केवल पुराने नारों और सोशल मीडिया कॉल के जरिए आज की नई पीढ़ी को किसी राजनीतिक एजेंडे से नहीं जोड़ा जा सकता। जब तक मुद्दे युवाओं के सीधे हितों से नहीं जुड़े होंगे, तब तक जंतर-मंतर जैसे ऐतिहासिक मैदान यूं ही सूने नजर आते रहेंगे।

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देश की पत्रिका डिजिटल संपादकीय टीम। निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता।